पौ फटते हीभारत के' प्राण' की प्रतिष्ठा' दैनिक भास्कर की आज की हेडलाईन । सब सवेरे से तो रोज ही उठ जाते हैं पर आज जैसे "जागे"। पापा बारम्बार पूछ रहे थे- "कब है प्राण प्रतिष्ठा" मम्मी का उत्तर आता था - "12 बज कर उनतीस मिनट से बारह तीस के बीच के 84 सेकण्ड्स... बस" हर बार यही, शब्दशः यही उत्तर!मैं तो उठकर नहा-वहा कर कुछ इस "दिन" के उपलक्ष्य में लिखने बैठ गई, मम्मी रोज के कामों में पार्विक उत्साह से जुट गईं। उनका तो निर्जल व्रत भी था। पापा छत पर लाईटिंग (सीरिज इत्यादि) लगाने की मशक्कत करने लगे।प्रातः 9:30पापा ढेर सारे फूल और साथ एक भगवा कुर्ता और केसरिया रंगी रेशमी झण्डा भी ले आए। कॉलोनी तो बीते दो-तीन पहले ही सज चुकी थी। अब पापा का मन था कि द्वार पर फूलों की वन्दनवार लगाई जाए । अगला 1:30 घण्टा मैंने और उन्होंने फूल की माला से वन्दनवार बनाने में बिताया।मैंने सोच रखा था कि प्राण प्रतिष्ठा वाले दिन एक खिलौना गुड़िया से छोटे से राम लला बनाऊंगी। मैं सुबह से ही अपनी गुड़िया को नीला रंग पोत कर धूप में छोड़ आई थी । ( 'राम' जैसे दिखने भर के लिए भी धूप में तपना तो पड़ेगा)लगभग 11:30 बजेइधर हम भाग-भाग कर नीचे द्वार पर तोरण लगाने में जुटे रहे उधर मोदी जी मंदिर पहुंच गए। तोरण लगाने में समय लगने से हमें अलग तनाव था जैसे राम जी आएंगे तो कहेंगे कि "बड़ी ख़राब वेवस्था है यार! तुम्हारी वन्दनवार अब तक नहीं लगी जबकि गा तो पिछले दो महीनों से रहे हो 'राम, आएंगे तो अंगना सजाऊँगी'...?"अंततः हमने यथाशीघ्र उसको द्वार पर सजाया और सरपट दौड़े टी.वी. के पास । मोदी जी भीतर प्रविष्ट हो रहे थे चांदी का मुकुट और पोशाक लिए। पण्डितगण से ज़्यादा हम सब अधीर हो रहे थे कि कहीं अभिजीत मुहूर्त निकल न जाए ।साढ़े पांच सौ वर्षों बाद आया अविस्मरणीय क्षणशुरु में तो मेरा ध्यान सब ओर था कि क्या नक्काशी है... कैसा परदा है.... छोटे से राम लला विराजमानः फूलों के बीचे लुके- छिपे से साइड फेस से दिख रहे थे । फिर आया जीवन का सबसे अविस्मरणीय समय :"एकाएक कैमरा रामलला विग्रह को दिखाने लगा...हृदय रुकने की संभावना की चेतावनी दिए बिना! एक पल पहले मन में इतनी उथल-पुथल थी जैसे उन्हें देखते ही शान्त हो गई। अश्रु, जो मेरी पलकों पर ही रहते हैं ऐसे बहने लगे जैसे कोई स्पंज को दबाए और उससे पानी बहे। अश्रु-धारा नहीं थी...प्लावन कहते हैं इसे । मन में कुछ नहीं था बस इसके सिवा कि कैसे इन्हें पाया जा सकता है। जैसे कोई सुन्दर वस्तु देखकर पाने को, स्वादिष्ट देख के खाने को मन ललचाता है.... वैसे । ऐसे टीस सी उठ रही थी कि मैं इतनी दूर क्यों हूं फिर अगले ही पल ये लगता था कि यहीं तो हैं। हैं... नहीं है.... मिल गए... चाहिए... सब जैसी भावनाएँ एक साथ । मुझे फ़फ़क फफक कर रोना आ रहा था। इतने सुन्दर... मनमोहक... आकर्षक.. इतनी स्मित मुस्कान.... इतना ऐश्वर्य उसके बाद भी जैसे अपनी विनयशीलता से सबको देखते हुए... प्रेम-वर्षा करते हों। मुझे इतनी स्नेहासिक्त अनुभूति हो रही थी कि जैसे 'मैं' चला गया था बस 'वे' थे।जब भी SCREEN पर रामलला को छोड़कर लोगों या हेलिकॉप्टर या यजमानों को दिखाते मुझे अजीब-सी पीड़ा होती (सामान्यतः क्रोध आता है) जितना देखें राघौ जी को मन ही नहीं भर रहा था। जब एक स्वामी जी ने नैवेद्य-अर्पण के समय चेहरे पर कपड़ा डाला तो ऐसे लगा जैसे लला उन्हें देखकर वही त्रिलोक-जित मुस्कान बिखेर कर देख रहे हैं ...शुरु की स्ट्रीमिंग में विग्रह साइड फेस से दिख रहा था। फिर जब रामलला का सुन्दर चेहरा सामने से दिखाया ... इतने आँसू भर गए कि दिखा ही नहीं.... झटपट पोंछ-पोंछ के देख रही थीं जैसे कुछ बेहद स्वादिष्ट मिला हो खाने को जो फिर कभी न मिलने वाला हो .... भकोस-भकोस कर देखने का मन हो रहा था। राघौ जी के चरण .. अहा... वे भी इतने सुन्दर थे कि बस देखते रहा जाए। धनुष जिस तरह चरणों के पास टिका दिखता था... श्री राम के शौर्य... बल... शक्ति उनके सर्वशक्तिमान होने और अपने, उनके संरक्षित-आश्रित बच्चे होने के गर्व और कृतज्ञता से ओत-प्रोत कर रहा था |इतने रुप... इतने भाव ! कभी लगता था कि बाल-रूप में हैं कभी सर्वेश्वर- सर्वशक्तिमान दुनिया के राजा राम कभी किशोर-गंभीर-स्नेही भाई ! एक पल शक्तिशाली श्रीराम से शरणागति का, तो भाई राघव जी से स्नेहिल अंकमाल पाने का मन करता था। सबसे सुन्दर तो बालरूप लला से प्रेम (जैसे किसी भी बच्चे की मैं गोदी में सिर रखा उससे सिर पर फिरवाना.. उसका, हमें बड़ों की तरह पुचकारना अच्छा लगता है ना ) पाने को मन मचलने लगता था।एक साथ एक समय पर इतनी दिव्यता - भव्यता और सारल्य भी।हम सभी पिछले कई दिनों से रोज़ "राम आएंगे " गाते - सुनते - गुनगुनाते रहे । जाने - अनजाने - किसी भी भाव से हमने उन्हें बुलाया ना... और सुना है भगवान सुनते हैं इसीलिए वे आ गए। इसीलिए ये विग्रह इतना जीवन्त लगता है। इसीलिए मेरे अश्रु बह रहे हैं। इसीलिए हम सब इतने भाव-विभोर हैं।रामलला स्वागत है।आपका नाम मन में सदा के लिए प्रतिष्ठित रहे...फिर आरती के बाद गर्भगृह से कैमरा बाहर निकल गया और ये सब पवित्र-आत्मीय भाव मेरे दिमाग़ से । कैमरा बाहरी मंच पर जा पहुंचा और इधर मन में उत्साह ने प्रवेश किया। ऐसा आनन्द आ रहा था जैसे अब कभी ख़त्म ही नहीं होगा।मैं अपनी गुड़िया और सारे उपकरणादि पहले ही ले कर बैठी थी पर राघव जी ने ऐसे मन को बांधा कि उन्हें ही देखते रह गई। अब स्वामी जी इत्यादि के भाषण सुनते हुए मैं अपनी सजाने लगी मुझे थोड़ा हीन लग रहा था कि राम लला तो कितने भव्य-दिव्य हैं क्या में इस गुड़िया को उसकी परछाई का अंश भी बना सकूँगी, पर इससे बेहतर और क्या था कि बार-बार इसी बहाने श्रीराम के स्वरूप का ध्यान होगा...?शाम होने तक यही चला फिर दीवाली वाली धूम मच गई। मम्मी का आदेश हुआ कि रंगोली भी बनाई जाए। मैं और पापा दीदी की अनुपस्थिति का लाभ उठाकर एक औसत डिज़ाइन की रंगोली चुनकर अनुपालन में जुट गए। हमने तीन शिखर; नीचे धनुष व 'जय श्री राम' लिखी रंगोली बनाई। फिर दिये लगाए गए, वस्त्र बदल कर 'राम जन्म स्तुति' व 'श्रीराम स्तुति' का सस्वर पाठ करके आरती की गई। पिछले कुछ समय से नियमित रूप से निकलने वाली मोहल्ले की सांध्य फेरी में आज मैं भी गई। रास्ते में एक घर के बाहर एक 4-5 वर्षीय (अपने रामलला की वय का) बालक हाथ में भगवा ध्वज लिए लहरा रहा था और बेहद प्रेम से 'जय श्री राम' से सबका अभिवादन कर रहा था। पता नहीं क्यों उसे देख मन द्रवित हो उठा। उस थोपी हुई ग्लानि से ये बालक बच गया जिसने मेरे जैसे कितने लोगों को अपनी आस्था को अपराध की तरह छिपाने को विवश कर रखा था...!!सियावर रामचन्द्र की जय!
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नवंबर 26, 2024
लला का दिन
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