...और रोज़ अलां फलां पीडीएफ खोलती पढ़ती मेरी आंखों के आगे
अचानक एक दिन रिज़ल्ट वाली पीडीएफ आ खुलती है..!
सुन्न शरीर में दिल ऐसे थर्राता
है जैसे आइडलिंग में गाड़ी का इंजन ! उस पल में मेरी "जब रिज़ल्ट आएगा तो ये
करेंगे" वाली सारी योजनाएं दिमाग के कूड़ेदान में जा कूदती हैं।
सालों की
मेहनत, आशाओं
और आकांक्षाओं का एक पहाड़ किसी नन्हें उत्साही बच्चे जैसे मेरे कंधे पर रिज़ल्ट
देखने झूल जाता है जिसे मैं कतई निराश नहीं करना चाहती।
जी चाहता है कि कोई और देख
कर बता दे कि नाम या नहीं! लेकिन कोई आता नहीं, आता है
केवल "कोई नहीं... घबराओ नहीं.... खोलो... देखो...क्या हुआ...नहीं हुआ क्या...
" का शोर।
अपने कोने कोने से हिम्मत खुरच पुरच कर मैं वो फाइल खोलती हूं। फाइंड इन पेज में अपने नाम का पहला अक्षर टाईप करने में मन घबराता है कहीं नॉट
फाउंड आ गया तो...! लेकिन ऐसे तो होता नहीं कि अपनी राशि में सभी की किस्मत
खराब हो इसलिए कुछेक रिज़ल्ट तो दिख ही जाते हैं...दूसरा अक्षर लिखना छोड़ उन्हीं हाईलाइटेड नामों में अपना नाम खोजती हूं...
....आंखो के आगे अंधेरा सा छाने ही लगता है
कि फिर दूसरों के नामों के काले बादलों को पीछे धकिया मेरे नाम का चंद्रमा जगमगा
उठता है....
जीवन एकाएक उजला हो जाता है।
मेरे होंट बुदबुदाते हैं "मम्मी मेरा सिलेक्शन हो गया" ये बहुप्रतीक्षित शब्द सुन मां का चेहरा खिल उठता है, हाथ श्रद्धा में जुड़ जाते हैं और आँखों में खुशी का सैलाब उमड़ आता है....प्रायः मंदहास्य दीदी हँसती हुई आ कर मुझे गले लगा लेती हैं। पास खड़ी मामीजी को अपना फ़ोन थमा मैं रिज़ल्ट फिर एक बार चेक कर लेने को कहती हूं। उनके आश्वस्त कर देने पर मन शांत हो जाता है।
अंदर उमड़ रहे भाव इतने विचित्र हैं
कि उन्हें एक शब्द में पिरोया जाना कठिन है। वैसी राहत... जैसे नंगे पैर तपती छत
को पार करके छांव में पहुंच कर लगता है। वैसा आराम जैसे किसी अनचाहे थकाऊ सफ़र से
घर लौट कर लगता है। रोमांच उतना, जितना कोलंबस झूले की सवारी में आता है...एक पल में आसमान
छू अगले में तेज़ी से नीचे आना। फिर बधाईयां सब भावों को पार्विक उत्साह में डूबो
देती है।
ये कुछ एमबी की फाइल जैसे कोई दरवाज़ा है जिसके खुलते ही
मैं किसी एक नई दुनिया में दाखिल हो गई हूं....
अब बिना सिलेबस के पाश में बंधे मन
कहे वो किताबें पढ़ पाऊंगी। तथ्य जुटाने या आंकड़े रटने के दबाव से मुक्त अब अख़बार
मनोरंजक लगेगा। जब मन चाहे जितना चाहे उतना फिल्में
निपटाऊंगी वो भी गिल्ट फ्री अब लो टू हाई फिल्टर बिना
विंडो शॉपिंग होगी। अब मेरे लिए भी रविवार, छुट्टी
का दिन हुआ करेगा। मेरे द्वारा भी सर्विस बुक, सी एल, ग्रेच्युटी, आईटीआर
जैसे शब्द धड़ल्ले से प्रयोग में लाए जा सकेंगे। सबसे बड़ा सुख तो ये कि किसी के
"आजकल क्या कर रही हो?"
पूछने पर हकबकाना नहीं पड़ेगा।
गंतव्य
तो क्या एक भुलावा है। यात्रा ही वास्तविकता। ये रिज़ल्ट वाली शाम एक नई सड़क है।
गड्ड मड्ड रास्तों, धूल भरी पगडंडियों में गिरते सम्हलते यहां तक आ पहुंची हूं।
शाम ढल रही है मैं चल रही हूं....