विपर्यय

            ‘युद्ध’ रोकने को;
हैं शांति सेनाएँ,
और आरक्षण,
            ‘समानता’ लाने को....!!
हैं छपी अपीलें;
कागज़ पर,
ख़ूब ‘पेड़’ लगाने को...!!

“दवा का बीमारी बढ़ाना”
शायद,
इसी को कहते हैं...
खोदते हैं हम रोज़ नये गड्ढे,
पुरानों को भरने को!!
और...
बस जगह बदल थोड़ी,
गड्ढे,
सदा बने रहते हैं…!!
                       -विशिष्टा ©