मम्मा तुमसे एक बात कहूँ, तुम नाराज़ न होओ अगर,
कि अच्छा नहीं लगता है मम्मा, जब जाती हो नानी के घर |
क्योंकि जाने के बाद तुम्हारे, ये घर हो जाता है ऐसा,
नौ रिक्टर के पैमाने पर, आया हो भूकंप कोई जैसा |
ना मिलती है पापा को टाई, ना मोज़े और ना ही रुमाल,
जितने चाहे अलार्म लगा लें,पर जल्दी नहीं उठ पाते हैं,
छूटती रोज़ स्कूल-बस मेरी, फिर पापा छोड़ने जाते हैं।
लंच-टाईम में मम्मा मुझको,ये सेंडविच बड़ा सताते हैं,
वो गरम- गरम आलू के पराठे, मुझे बड़े याद अब आते हैं |
जाते हुए जो तुमने मम्मा, था वादा मुझसे एक लिया,
"ना रोऊँगी" कहकर भी मैंने,सॉरी मम्मा! वो तोड़ दिया |
थी परेशान मैं,दु:खी बहुत थी,कल बिना तुम्हारे जो सोई,
आज सुबह इसलिए ही मम्मा,खूब
ज़ोर से मैं रोई |
टॉफी दे कर पापा ने,
पहले थोडा बहलाया,
फिर मेरे चुप हो जाने पर, प्यार से मुझको समझाया|
"..कि गुड़िया जैसे तुमको अपनी,
मम्मा की याद रुलाती है,
वैसे ही मम्मा को भी तो,
नानी की याद सताती है |"
ऐसा है तो मम्मा फिर मैं,
एक ना आंसू आने दूँगी,
लेकिन अब के बाद कभी ना,
तुमको मैं जाने दूँगी |
छोड़ के मुझको अब जाने की,
बात भी तुम भुला देना,
याद जो आए नानी की तो,
नानी को ही बुला लेना|
-विशिष्टा ©

