रीत...


थे खुशियों से सराबोर स्वजन;
बिटिया की सज रही थी डोली,
तब उमड़ा दुलार बाबुल का,
और पनियाई आँखें बोलीं-
प्यार से मैंने बोया तुझको अपनी इस फुलवारी में,
आज जा रही बिटिया तू भर सूनापन हर क्यारी में|
लगता है मुझको अब भी जैसे तू है वही नन्ही-सी कली,
पर सच तो है कि बनकर फूल अब तू मुझको छोड़ चली|
बनेंगी मेरा संबल बिटिया मीठी-मीठी यादें तेरी,
जा तू नया संसार बसा ले कर ये दुआएँ मेरी-
दुःख के काँटों से दूर कहीं बिटिया तेरी इक बगिया हो,
सुख के भौरें हों संगी तेरे तितलियाँ खुशी की सखियाँ हों|
इस जीवन-उपवन का बिटिया तू है सबसे प्यारा फूल,
प्यार से तुझको जिसने सींचा उस माली को न जाना भूल|

                    ऐसा कहकर जब बाबुल की,
                    आँखों में पानी भर आया,
                    गले लगा बूढ़े बाबा को,
                    बिटिया ने यूँ समझाया-

बाबा फूलों को सहेज सदा माली भी कहाँ रख पाता है,
है भाग यही इन फूलों का ले चुरा पराया जाता है,
मेरा भी है भाग यही कि संग मैं पराये जाऊँगी,
पर अपनेपन की खुशबू से अपना सबको बनाउँगी|
सौगात तुम्हारी ही है बाबा इस जीवन का हर पलछिन,
तुम्ही कहो क्या भुला सकूँगी फिर मैं तुमको इक भी दिन!
तुम्हारे दुलार की छाया में जाने कितने मौसम बीते,
आने वाले मौसम तुम बिन लगेंगे बाबुल रीते-रीते|
पर, फूल मुझे कहते हो ना तो फिर मुझको जाने दो,
खुशियाँ जग में फ़ैलाने की फूल की रीत निभाने दो|  



पहले जब भी नन्ही बिटिया रूठकर आंसू बहाती थी,
बाबा के समझाने पर तब झट से चुप हो जाती थी|
हुआ उलट अब बूढ़े बाबा,बच्चों से रोते जाते हैं,
आज बिटिया के शब्द कैसे,बाबुल को समझाते हैं!
ह्रदय था पुलकित आँखें नम थी बिटिया की फिर हुई विदाई
जाते देख अपनी लाडो को बरबस फूटी माँ की रुलाई|
बरसों से नन्ही के ब्याह का,जो माँ सपना संजोती थी,
आज उसी के सच होने पर,सिसक-सिसक कर रोती थी|
अब तक जो सबसे अपनी थी,पलभर में ही हुई पराई,
बिटिया से बिछोह की ऐसी,जग ने क्यों है रीत चलाई?
                                                                                                                                                          -विशिष्टा ©