मेरी खिड़की में लहराते ,
ओ! जामुन...
क्यों सारी हवा समेट ले जाते हो?
याद करो मैंने छुटपन में,
था जो काला जामुन
खाया,
उसकी ही गुठली से बच्चू !
तुमने ये तन है पाया,
मैंने तुम्हे वजूद दिया क्यों ये भूले जाते हो?
प्यार-दुलार अपनी मम्मी का,
जो मैंने तुमसे बाँटा है,
भाई-से लगते हो तुम,
तुमसे गहरा नाता है|
इक्का-दुक्का जामुन यूँ जो मेरे लिए गिराते हो,
चिढ़ा-चिढ़ा दुलारने का क्या भाई का फर्ज़ निभाते हो?
ढीठ बने खड़े रहते,
हो भिड़ जाते तुम अंधड़ से,
बागी पत्तों को डांट पिला,
हो वापस लाते पतझड़ से|
इतना सब्र, कुव्वत इतनी, कहो कहाँ से लाते हो?
कितना पूछा तुम न बोले क्यों मुझसे न बतियातेहो?
अक्सर जो मैंने गुरुर में,
लोगों से मुँह मोड़े हैं,
ज़िद, नादानी से पनपे,
अबोले जो न तोड़े हैं,
क्या अनदेखी वही, रूखापन वैसा...महसूस मुझे भी कराते हो?
ओ जामुन...तुम तो मुझको मेरा ही अक्स दिखाते हो..!!
-विशिष्टा ©
