पुनरावाहन

जतन से या जन्तर से, 
दे कर मन को छूट निपट,
या शम-अभ्यास निरंतर से..?

न जाने कैसे मैंने पाया था..
या चिरौरियों से खीझ कर,
मनुहारों पर रीझ कर,
तुमने ही बरसाया था..
  
सामीप्य का वो स्नेह अपार,
दे दो न फिर से,
ओ दातार!

देखो-
है ऊँची बात निदिध्यासन,
मुझे न स्तव आए न ही पूजन,
मूढ़ मैं मर्म क्या जानूँ भक्ति का,
बस मानो-
कि है उमड़ता प्रतिपल,
सागर एक भीतर रक्ति का...!!
सुनो-
कि भर वाचा अमोघ अमिय से,
रोम-रोम से, पुलकित हिय से,
कृष्ण...कृष्ण उच्चारा है,
आओ-
पुल प्रीति का मैंने,
दूजी बार सँवारा है...!!
                                           
                                      
प्राक्तन से या पात्रत्व से मेरे,
करो अहैतुक कृपा स्वयं,
या मांगूँ साग्रह स्वत्व से मेरे..?

कहो न दोगे किस विधि वो..
जो अभिव्यंजित..जो अबूझ-अदेह,
आगे जिसके स्वर्गश्री खेह,
अब अस्तंगत थी निज निधि जो..

वही निकटता फिर दो निर्बाध,
बांधवी करे बस,
यही अनुराध!
                                       
                     

                  -विशिष्टा ©