सदर्प
वह मुस्काई |
मुस्काई मुझे देखकर ,
और
तपाक से बोली ,
देखो तो ज़रा कैसी है ,
ये
नियति की ठिठोली |
जीवन मेरा काया मेरी ,
सब
तुमसे ही पाया है,
पर मेरा ये क़द तो देखो,
तुमसे
ऊपर हो आया है |
मैंने उससे कहा विहँस,
इस
क़द पर न इठला इतना ,
पहले एक सच मुझसे भी सुन ,
फिर
बढ़ना तू चाहे जितना |
दो अंगुल ऊपर ही सही ,
पर
है तो तू मेरा साया ,
ओ' सच
तो मैं ही हूँ तू तो है ,
बस
एक झूठी सी माया |
इस विधि का विधान सारा ,
यही हमेशा
कहता है ,
सच है शाश्वत सदा एक सा,
झूठ
बदलता रहता है...... |
-विशिष्टा ©
-विशिष्टा ©

