नदी हूँ मैं;
हरपल किलकती हूँ,
सूरज की किरणों को पा, सोने-सी चमकती हूँ |
पाहुन-सी बाधाएँ काट मैं; आगे बढ़ती जाती हूँ,
चलती रहती हूँ तब तक; जब तक गंतव्य न पाती हूँ |
मृत्यु मानूंगी इसको मैं अपनी; थककर जो रुकी कहीं,
जन्मी हूँ चलने के लिए फिर रुकना मेरा काम नहीं|
क्रोधित हूँ तो प्रलयंकारी मैं; हूँ आह्लादित जब तो सृष्टा हूँ,
उदधि की जो खोज में निकली मैं, वन्या हूँ …विशिष्टा
हूँ
!!
-विशिष्टा ©
