परिचय


जानना है तुम्हें ; कैसी हूँ मैं,
तो सुनो मुझसे;जैसी हूँ मैं |

नदी हूँ मैं; हरपल किलकती हूँ,
सूरज की किरणों को पा, सोने-सी चमकती हूँ |

पाहुन-सी बाधाएँ काट मैं; आगे बढ़ती जाती हूँ,
चलती रहती हूँ तब तक;  जब तक गंतव्य न पाती हूँ |

मृत्यु मानूंगी इसको मैं अपनी; थककर जो रुकी कहीं,
जन्मी हूँ चलने के लिए फिर रुकना मेरा काम नहीं|

क्रोधित हूँ तो प्रलयंकारी मैं; हूँ आह्लादित जब तो सृष्टा हूँ,
 उदधि की जो खोज में निकली मैं, वन्या हूँ विशिष्टा हूँ !!
                                                        
                                                         -विशिष्टा ©