भ्रमर - भ्रम


सुन्दरता के आवरण से आच्छादित,
उस अनूठे कुसुमाकर में,
एक भ्रमर उड़ता आया |
डयन कर हर द्रुम-लता पर,
मुग्ध हो रसपान करता,
भाललिपि पर इठलाया ||

जब पड़ी द्विरेफ़-दृष्टि, एक शुचि-शतदल पर,
जो पड़ा था पुष्कर-पंक में |
ध्यान अपना न
रहा, मकरंद जो उसको मिला,
खो गया वह फिर पद्म के ही अंक में ||

न जाने क्या ऐसा था थोड़े-से पुष्पासव में,
कि अपनी भी सुधि भूल गया वह अम्बुज-रक्ति में |
दल सारे उस जलज के बंद हुए संध्या को जो,
भौंरा भी बंद हुआ फिर तो,
उसे काल का ग्रास बनाया उसकी ही आसक्ति ने ||

जो षट्पद निज बाहुबल से, काष्ठ को भी विक्षत कर दे,
अब कालरूप इस उत्पल को भी छेद न पाया |
मोह के इस जाल को भौंरा तोड़ न सका,
अपने प्रिय सरसिज को आमरण न छोड़ सका,
ये मधुप-मति देखकर मेरा मन मुरझाया ||
                                                                                  -विशिष्टा ©