फ़रवरी 21, 2025

साक्षात्कारस्य प्रथम दिवसे

घर

वो सुबह खास थी। रात भर नींद नहीं आई थी। लेकिन उठने पर लगा नहीं कि सोई नहीं। एक डरावना सपना आया था कि मुझे आदरणीय जी का बोर्ड मिला है और वे धड़ाधड़ प्रश्न पूछ रहे हैं लेकिन मुझे एक भी नहीं आ रहा और मैं हँस रही हूं...!! मैंने अपनी माताजी को नहीं बताया.... खुद से भी कहा भूल जाओ!! बस सब ऐसे ही चला। सूट पहनना तय था तो तैयार होने में वक्त ही नहीं लगा। माताजी के बताए अनुसार श्री शंकर देव का पूजन किया, उस दौरान मैंने "शिव मानस पूजा", "रुद्राष्टकम" गा लिए... एक "द्वादश ज्योतिर्लिंग स्तोत्र" ही बचा था... जो बाद में गाने को मिला!! फिर दीदी ने थोड़ा बनाया सॅंवारा , माता जी ने पुचकारा और बैग तैयार किया। बैग तो ऐसा था मेरा जैसे पिकनिक पर जा रही होऊॅं! फिर मुझे विदा करते समय मैं , दीदी और माता जी एक पल के भी आधे पल में कुछ भावुक हो गए। बिना बोले जैसे बोल रहे थे कि इतने सालों के संघर्ष की यात्रा है जो ये आज उसका आखिरी पड़ाव आया है... या ये कि इसके बाद और चलना पड़ेगा...!! फिर मैं , पापा और नीलमणि चल दिए आयोग की ओर...! रास्ते में चाहा हनुमान चालीसा सुन ली जाए।आखिर सारी शक्ति वही तो देते हैं! चालीसा पूरी होने से पहले ही आयोग आ गया...!

आयोग के बाहर

माहौल था वहां पूरा....!!! सूट बूट से लैस लड़के... सुंदर प्यारी सारी लड़कियाॅं... मैं गाड़ी में ही बैठे बैठे उन्हें देख रही थी। हम सारे यूं तो एक दूजे के प्रतिद्वंद्वी हैं लेकिन क्या एक अदृश्य डोर नहीं है जो हमको बाँध कर एक कुटुम्ब बनाती है?! परीक्षा की तारीख आने से ले कर आज तक जो जो बीता है हम सबने एक साथ महसूस किया है। हमारे बीच ऐसा कुछ साझा है जो हमारे अपने भी समझ नहीं सके होंगे। तो मुझे तो बेहद अपनापा लग रहा था इन सबसे!! फिर एंट्री शुरू हुई। अंदर लंबी लाईन लगी थी। ये वो वक्त है जब आप उन सबसे मुखातिब होते हैं जिनके स्कोर को ले कर आप दिन रात सोच रहे होते हैं। मैं ही थी जिसने सूट पहना था। फैसले से नाखुश भी नहीं थी।

आयोग के भीतर

सबसे पहले कतार में लग मोबाईल फोन जमा करने की कवायद शुरू हुई। मुझे बेहद आश्चर्य हुआ (और ज़ाहिर तौर पर गुस्सा तो ऐसा आया के आदरणीय जी का बोर्ड मिलने का शाप दे दूं) जब एक सूट बूट धारी लड़का अचानक से आकर मेरे आगे लग गया। जब ऐसे काबिल, पढ़े लिखे लोग लाईन तोड़ बीच में ना घुसने का सिविक सेंस नहीं समझते तो आम जनता से क्या उम्मीद रखना। ख़ैर अपने साये- से साथ रखने वाले दुलारे फोन को सौंप कर मैं उस ऑफ़िस बिल्डिंग से बाहर आई। जल्दीबाज़ी या मेरी लापरवाही की सुपर पॉवर के चलते मैं याद ही नहीं कर पा रही थी कि नंबर तो 10 है लेकिन बोर्ड ए कहा या सी। फिर इसी उधेड़बुन में वहाँ मैंने झटपट दो दोस्त बनाए, उन्होंने मुझे आश्वस्त किया कि सब अंदर पता चल जाएगा और इसी बहाने मेरे पिकनिक वाले झोले में अपने हाथ में लाए लंच बॉक्सेस भी रख दिए। इस तरह हम आगे बढ़ एक बड़े हॉल या लॉबी में पहुंचे। यहाॅं कई सारे सोफ़ा लगे थे। खचाखच भरे। जगह खोजनी पड़ी (पता नहीं कब खतम होगा ये कंपटीशन)  

      हम सब कितने अलग थे। कोई डरा हुआ, कोई खुश, कोई सहमा सा बैठा था तो कोई एकदम आत्मविश्वास से लबरेज़! एक मैं थी जो पेंसिल से ले कर स्टेपलर पिन तक ले कर गई थी और एक कोई अपनी डिग्री के बिना ही चला आया था। फिर मैंने पाया कि हम सब एक-से भी तो कितने थे। ये जो हल्की सी घबराहट है, रोमांच है, भरोसा है....सबमें एक जैसा ही तो है!        

मैंने एक जगह ढूंढी और अपने कागज़ पत्तर रख कर मैं बैठ गई। फिर मुझे मिलीं एक सखी जी। उनसे मुझे कुछ उन्हें मुझसे हिम्मत मिली, कि सब अच्छा होगा। दो क्वींस की तरह हम दोनों ने एक दूसरे के पहनावे और बोलने के अंदाज़ इत्यादि की तारीफ़ की। माहौल अच्छा था। सुगबुगाहट थी...कौन सा बोर्ड किसको मिलेगा...!!         

एक रजिस्टर जो मैंने अक्टूबर में खरीदा था और  उसमें अपने नाम की जगह लिखा था "तू है कौन?"

ये आज भी मेरे साथ आया था। मैं अपने बारे में पढ़ रही थी। लग रहा था अब भी सबकुछ तो नहीं आता। कितना अजीब नहीं है...खुद को भी जानते नहीं हम। ख़ैर पढ़ते पढ़ते बार बार चैट जीपीटी की याद आ रही थी। कई बार मैंने अपना मोबाईल खोजा कि ज़रा ये गूगल करके देखूँ । बीच बीच में सखी जी और उनके बगल में बैठे गुना वाले भाई साहब से बात हो रही थी। फिर मैंने सोचा हाइड एंड सीक खा ही लेना चाहिए क्योंकि इंटरव्यू बिगड़ा तो फिर मन नहीं होगा।

     इसी बीच नाम गूंजा "लॉर्ड भाई का" मैने कहा अच्छा तो ये महाशय हैं लॉर्ड!!” गुना वाले भाई हंसकर बोले अच्छा आप भी जानती हैं मैंने बोला अखिल ब्रह्माण्ड इन्हें जानता है। लॉर्ड जी वो फैंटम हैं जो 155 का बिल ले कर सब पर फाड़ते आ रहे हैं। फिर कुछ देर में मेरा भी नाम पुकारा गया। वेरिफिकेशन के बाद जब मैं लौटी तब लॉर्ड भाई मिठाई बांट कर बधाईयाँ गा रहे थे। उन्होंने बताया के वे बोर्ड ए में 8 वें क्रम पर हैं, मैंने छूटते ही कहा "भाई प्लीज उनका दिमाग खराब करके मत आना" फिर बात सम्हाल कर कहा कि "मतलब उनकी एक्सपेक्टेशंस हाई मत कर देना " कहने लगा ...."मैडम आप बोर्ड ए में हैं ना ? ..... वो अध्यक्ष जी का है...!" मुझे लगा मेरे कानों में किसी ने मिश्री घोल दी हो। उससे कहा कि अगर मैं गई अंदर और मुझे दूसरे कोई मिले तो मैं तो मुंह ही बिचका दूंगी.... लेकिन वो बहुत ही आश्वस्त था। कारण? ये कि उसके हिसाब से चेयरमैन सर हमेशा बोर्ड ए ही लेते हैं । मैंने सोचा भोले भाले लोगों का भी बढ़िया है। कितना खुश है। इतना फालतू लॉजिक लगा कर। फिर सोचा कि इसमें नुकसान ही क्या है और मैं भी शामिल हो गई। हमने अध्यक्ष जी की अभिरुचि अनुसार बहुत से प्रश्नोत्तर तैयार कर लिए। नंबर 7 और लॉर्ड भाई का नाम अनाउंस हुआ और भृत्य अंकल दोनों को ले कर चले। मैंने कहा "ऐसे ले जा रहे हैं जैसे जिबह करने ले जाते हों" मेरे बाजू में बैठे महाशय जिनसे अब तक परिचय नहीं हुआ था बोले "क्या कहा आपने" मैंने कहा "जिबह" और वो हंसने लगे..."शानदार" ! पता चला कि वे विदिशा से थे और हाइड एंड सीक बिस्किट्स को भी ना कर सकते थे ( मतलब How on earth?) उनका हावभाव ऐसा था जैसे हम सब नन्हें बच्चे हैं उनके आगे। उन्हें कोई अता पता नहीं था कि ये बोर्ड क्या बला है और अध्यक्ष जी, आदरणीय जी और सम्माननीय जी किसके रिश्तेदार हैं! मुझसे उन्होंने सब पूछा और मुझे लगा कि यही बंदा सही है हम सब इतने दिनों से रोना पीटना कर रहे हैं और एक ये हैं अपने में खुश!!

इसी बीच किसी बोर्ड सी वाले की नज़र हमको लग गई और अध्यक्ष जी, सम्माननीय जी में बदल गए। लंच ऑर्डर करने के लिए बाहर जाने की अनुमति थी। कुछ बच्चे खाने के साथ खबर लेते आए कि बोर्ड ए, सम्माननीय जी का है और बोर्ड सी, आदरणीय जी का। फिर आया मेरा नाम... नंबर 8 वाली कन्या के संग! मैंने उससे सीढ़ी चढ़ते हुए मित्रता गांठ ली।

साक्षात्कार कक्ष के बाहर

ऊपर माहौल एकदम खतरनाक तरीके से शांत था। वहां देखा तो लॉर्ड भाई विराजमान थे। एक और भाई था नंबर 7...फिर लॉर्ड...फिर कन्या...फिर मैं !! हमारे सामने वाली बैंच पर बोर्ड सी के उम्मीदवार बैठे थे। उनकी मुस्कुराहटें दर्द भरी थीं। लॉर्ड भाई ने बताया कि आदरणीय जी बहुत देर देर तक पूछताछ कर रहे हैं बच्चों से। फिर इधर उधर की कई बातें होती रहीं। फिर वो टेलीग्राम ग्रुप के मेंबर्स के स्कोर बताने लगा... इसके उतने उसके इतने। कन्या ने कहा " मत बताओ यार" लेकिन लॉर्ड लोग सुनते कब हैं। तभी आदरणीय जी के बोर्ड से एक लड़की बाहर आई। उसके हाथ आँखों की तरफ़ जाने ही वाले थे कि उसको सबने कहा "कोई नहीं...सबका ऐसा ही जा रहा है"...इधर लॉर्ड भाई बोल पड़ा "इनके 152 हैं" और कन्या तुरंत उठकर खड़ी हो गई। मुझे लगा स्ट्रेस कम करने के लिए वॉक कर रही होगी। इतने में नंबर 7 बाहर आया और हमने उसे घेर लिया... वो थोड़ा हक्का बक्का था बोला "फैक्ट्स पूछ रहे हैं... हड़प्पा का क्षेत्रफल पूछा" और चला गया। मैं तो हताश हो गई। कन्या ने कहा कुछ नहीं जो नहीं बनता हमसे वही सर पर चढ़ जाता है। फिर हमने मेरे नोट्स में हड़प्पा सभ्यता के ऐसे ही सस्ते फैक्ट्स पढ़ डाले! तब कन्या ने मुझसे शिकायत की कि "कौन है ये यार लॉर्ड ! मैंने कब से किसी के मार्क्स नहीं पूछे लेकिन इसने ऐन मौके पर बता कर दुखी कर दिया" मैं अकिंचन उसे क्या बताती लॉर्ड भाई के बारे में। सिर्फ यही कहा कि "इसको बाहर जा कर कूट लेना कोई नहीं!"  फिर लॉर्ड भाई आया ...बेहद खुश... जाते जाते बता गया मुझे कि वो कंसेप्चुअल चर्चा कर रहे हैं। सुनकर अच्छा लगा। कन्या गई मैं बैठी अपनी "हारिए न हिम्मत" किताब पढ़ने लगी। आँखें बंद करके मैंने अपना सारा ध्यान लाड़ली जू के नाम में लगाया... कहा "मैं तो सिर्फ ये शरीर ले के अंदर जा रही हूं बाकी जो है प्राण, मन, विचार, शब्द और भाव वो आपके हैं...मेरा कुछ नहीं है!"  तभी एक सुंदरी और एक अन्य उम्मीदवार को लाया गया जिससे मेरी छोटी सी तपस्या टूटी। वो मेरे पास आकर बैठे, मैंने उससे भी दोस्ती की, हमने एक दूसरे की तारीफें करके मनोबल बढ़ाया। फिर आया मेरा नंबर!! कन्या ने भी यही बताया कि गहनचर्चा कर रहे हैं। मुझे कुछ अच्छा लगा! अगला साक्षात्कार मेरा ही था। मैंने बंद दरवाज़े के सामने खड़े-खड़े मन ही मन बुदबुदाया "मेरे भविष्य का द्वार" और मुस्कुराई! फिर यही मुस्कराहट लिए अंदर गई।

साक्षात्कार कक्ष में

बड़ा कमरा था। षड्कोणीय टेबल को तीन सदस्य सुशोभित कर रहे थे। ठीक सामने कुर्सी लगी थी। उन्होंने कहा आईए आईए.... जल्दी आईए। मैंने कहा "आप सभी को मेरा नमस्ते" अभिवादन स्वीकार कर उन्होंने मुझे बैठने के लिए कहा। कुर्सी और मेज की दूरी इतनी कम थी कि मुझे "सांस अंदर खींचासन" करके फिर बैठना पड़ा! 

फिर बोर्ड के मुख्य, सम्माननीय जी ने मुझे पूछा: "रोल नंबर बताइए"

(पैनल में तीन सदस्य थे) मैं: 16.. सम्माननीय जी : अरे 16? मैं: खी खी खी माफ कीजिएगा सर 140624 (वो हंस पड़े ) सम्माननीय जी: सोनिया जी आप अपना परिचय दीजिए पैनल को मैं: मेरा नाम....पढ़ाई का ब्यौरा दिया। फिर मैंने सर मेरी अभिरुचियों में है लेखन। मुझे लिखना अच्छा लगता है। मेरा एक ब्लॉग है "जलेबियाॅं"। सदस्य 1: जलेबियाॅं? और हँसने लगे। मैं: खी खी खी के साथ जी सर। इसके अलावा मुझे गायन पसंद है। सदस्य1: गायन किस प्रकार का। मैं: सर सुगम संगीत। प्रज्ञा गीत, जो चेतना जागरण के गीत हैं। सदस्य2: (कोष्टी जी को देखकर) "चेतना जागरण के" मैं: खी खी जी सर। (सभी मुस्कुराए, मुझे समझ नहीं आया व्यंग्य था या हर्ष) सम्माननीय जी: आप उज्जैन से हैं, संस्कृत भी पढ़ी है तो 12 ज्योतिर्लिंग के नाम बताइए मैं: (सौराष्ट्रे सोमनाथम च) धीमे धीमे गा कर, सर सोमनाथ, सौराष्ट्र में। सम्माननीय जी: अच्छा श्लोक आता है? सुनाएँगी। सुनाइए! मैं: ( मैंने द्वादश ज्योतिर्लिंग स्तोत्रम् गाया। यही था जो सुबह गाया नहीं था। मैंने तो इसे बाबा की इच्छा माना) सम्माननीय जी:  अच्छा हो गया पूरा, आ गए सारे नाम मैं: जी सर सम्माननीय जी: अच्छा सोनिया आप देवी अहिल्या विश्वविद्यालय से पढ़ी हैं, खरगोन से हैं, तो देवी अहिल्या के बारे में पढ़ा होगा मैं: खीखियाते हुए हां सर!! ( मेरी तो मानो लॉटरी लग गई। मातोश्री पर तो मैं महीने भर में एक समझो पीएचडी ही कर ली थी) सम्माननीय जी: इस वर्ष हम क्या कुछ विशेष हो रहा है उनसे संबंधित? मैं: जी सर मातोश्री की 300वीं जन्म शती मनाई जा रही है। सम्माननीय जी: हाँ और इसी के उपलक्ष्य में कई सारे आयोजन किए जा रहे हैं। आप बताईए कि उन्हे देवी, पुण्य श्लोका और राष्ट्र सेविका क्यों कहा जाता है। मैं: सर देवी तो उन्हें उनके व्यक्तित्व और कृतित्व के लिए कहा जाता है। मैं एक उदाहरण दूं, कोष्टी जी: हां हां दीजिए मैं: हमारे खरगोन के जिला अस्पताल के आगे अहिल्या माता का एक स्मारक है। वहां मैंने कितनी ही बार रोगी के परिजनों को हाथ जोड़े खड़े पाया है। (सभी मेरे उत्तर से पर्याप्त संतुष्ट लगे) सम्माननीय जी: अच्छा फिर ये पुण्यश्लोका मैं: सर पुण्यश्लोक उन्हें कहते हैं जिनके स्मरण मात्र से पुण्यों की प्राप्ति हो जाए। ऐसे केवल 4 व्यक्ति हैं, श्री कृष्ण, राजा जनक,सम्राट युधिष्ठिर और राजा नल!! और आपने पूछा था राष्ट्रसेविका, तो वो इस अर्थ में कि सबसे पहले उन्होंने एक लोक कल्याणकारी राज्य स्थापित किया। दूसरे उन्होंने मंदिरों के महत्व को समझा कि यदि मंदिर हैं तो शिक्षा है मंदिर हैं तो जन कल्याण है और इसी लिए कई मंदिर बनाए।( इसी में मोदी जी ने जो काशी विश्वनाथ के टाइम उनकी मूर्ति लगाई वो भी बता दिया)। इसके अलावा उन्होंने एक ऐसा सशक्त राज्य बनाया जो 1818 तक कायम रहा और अंत तक लड़ता रहा रहा पूरे मराठा साम्राज्य में। मातोश्री स्वयं महिला सशक्तिकरण के लिए मिसाल रहीं और इस दिशा  में कई प्रयास भी किए। ( माननीय सदस्य 1 कुछ सख्त थे कभी कभी ही मुस्कुराते थे लेकिन सदस्य 2 हँसमुख थे) सम्माननीय जी: अच्छा सर आप पूछिए अब सदस्य2: सोनिया जी आपने MA में कौन कौन से विषय पढ़े थे। मैं: बचते बचाते बता दिए सदस्य2: अच्छा सोनिया ये जो भारत का नाम है ये कहीं आता है क्या मैं: जी सर विष्णु पुराण में सदस्य2: क्या कैसे मैं: उत्तरस्य .. (मैं थोड़ा ठिठकी तो दोनों माननीय सदस्यों ने ही पूरी कर दी पहली पंक्ति) मैं: सर मैं अर्थ बता देती हूं कि हिमालय के दक्षिण में, समुद्र के उत्तर में फैला भू भाग भारत और इसके निवासी भारतीय कहे जाते हैं। (यहीं किसी ने पूछा किस समुद्र के उत्तर में) मैं: हिंद महासागर (ठीक ठीक) सदस्य 2: अच्छा गांधार और मथुरा कला में अंतर बताइए! मैं: बता दिए (मैं इतने लंबे उत्तर दे रही थी लेकिन उन्होंने मुझे रोका नहीं, मुझे ही स्वयं को रोकना पड़ा कि इतना बहुत है अब चुप हो जा बहन) सदस्य2: ठीक ठीक। विश्व इतिहास में धर्म सुधार के नेता कौन थे? मैं: सर मार्टिन लूथर। उस समय धर्मतंत्र द्वारा जो जन सामान्य का आर्थिक शोषण किया जा रहा था उसी का उनने विरोध किया। (इसी तरह का अमूर्त उत्तर कुछ चतुराई से ताकि वो कोई फैक्ट ना पूछ बैठें) सदस्य2: (सहमत होते हुए) ठीक है। (सदस्य1 जो बहुत देर से बात पकड़े बैठे थे ) सदस्य1: सोनिया आपने कहा कि महिला सशक्तिकरण किया अहिल्या बाई ने तो आपके हिसाब से महिलाओं को ज़रूरत थी क्या शक्ति की। हम डरा धमका कर रखते थे ? कहीं आप वेस्ट के नेरेटिव से प्रभावित तो नहीं हैं?? (मेरी तो मुस्कुराहट कानों के कोनों को छू गई। मैंने सोचा इन्होंने तो मेरे दिल की बात बोल दी। मैं खुद भी यही सोचती हूं लेकिन यहां ध्यान से जवाब देना होगा क्या पता मुझे ट्रैप कर लें)

मैं: सर सशक्तिकरण से मेरा मतलब था कि किसी को निर्णयों और अवसरों को भुनाने में सक्षम बनाना.... सदस्य1: हां मतलब शक्ति तो नहीं थी ना नारियों में मैं:सर मैं जानती हूं कि भारत ही एकमात्र ऐसी सभ्यता है जहां वैदिक काल में ऋषिकायें हुईं और हम प्रगतिशील ही थे लेकिन मैंने देवी अहिल्या की बात की जिनका काल मध्यकाल था। तब तक इस प्रकार की कुछ.... ( सदस्य2 इतने खुशी से देख रहे थे जैसे मैं उनकी रिश्तेदार हूं। हामी भरने लगे मेरी बात पर लेकिन मेंबर 1 बीच में ही बोलने लगे) सदस्य1 : अच्छा मतलब मध्यकाल में सब खराब थे। तो रानी रूद्रम्मा, देवी अहिल्या (और कई ऐतिहासिक नारियां) ये सब क्या शक्ति हीन थे। मैं: सर मैं वहीं आ रही थी कि हमारी संस्कृति सामासिक है, जब आक्रांता आए तो उनकी सोच थी कि महिलायें संपत्ति हैं। उन्होंने हमें उसी तरह से अटैक किया और इसी के चलते हमें अपनी स्त्रियों की सुरक्षा के लिए कुछ उपाय करने पड़े जो बाद में थोड़ी विकृतियों का कारण बने.... (सम्माननीय जी जो अब तक मेरे 70 पेज के दस्तावेजों में मगन थे, सर उठा कर चश्मा रख कर बैठ गए और मुझे देख कर सुनने लगे) सदस्य1: अच्छा विकृत हो गया हमारा समाज मतलब क्या? चलो मैं ही बोल देता हूं पर्दा,सती,जौहर.... जौहर पर आपका क्या विचार है? मैं: सर मेरे लिए यह एक इतनी ऊंची बात है जिसको मैं दुनियावी चीजों से माप ही नहीं सकती। मेरे हिसाब से इसको उसूलों और अध्यात्म की दृष्टि से देखा जाना चाहिए! सदस्य1: आप बस इतना बताईए कि आप जौहर से एग्री करती हैं या disagreee मैं: (कुछ रुक कर मैंने सोचा कि तर्क तो दे ही चुकी हूं ) सर agree करती हूं!! सदस्य1: बस यही सुनना चाहता था मैं! और सती? मैं: सर मुझे लगता है इस पर अभी और शोध करना चाहिए। Dr मीनाक्षी जैन जी की हाल ही में एक पुस्तक आई है इस बारे में सदस्य2: (खुश हो कर) अच्छा आपने पढ़ी है मैं: सर अभी अभी ही आई है मैंने उन्हें सुना है इस बारे में समझाते हुए! सदस्य2: अच्छा अच्छा बताईए सदस्य1: नहीं हमको तो सोनिया जी के ही विचार जानने हैं! मैं: जी सर मैं कहूंगी कि मुझे कुछ सदस्य2: (मेरी सहायता करते हुए) आप तो सर को बस ये बता दो कि वो कह रहे हैं सती होने की प्रथा थी... थी क्या?? मैं: जी सर अब मैं समझ गई । यदि आप इसे" प्रथा" कह रहे हैं तो वो त्रुटिपूर्ण होगा। परंपरा में अनिवार्यता होती है यहां वो नहीं थी! सदस्य2: (मुस्कुराते हुए) बस सोनिया जी यही बोलना था!! मैं: जी सर मुझे लगता है मेरा शुरू में महिला सशक्तिकरण वाले वक्तव्य का मंतव्य कुछ अलग अर्थ ले गया!! ( सभी हल्का सा मुस्कुराए) सदस्य1: आपका पसंदीदा हिस्सा कौनसा है इतिहास में मैं: सर मुझे प्राचीन भारत और उसमें भी शुंग काल अच्छा लगता है। मैंने उस पर पढ़ने का प्रयास किया है। सदस्य1: क्यों? मैं: पहला तो यही कि मैंने संस्कृत साहित्य पढ़ा है उसमें महाकवि कालिदास जी का "मालविका अग्निमित्रम" पढ़ा था। उसमें इतिहास पढ़ा तो आकर्षक लगा। दूसरा मैंने देखा है कि शुंगों पर रोज नए आक्षेप सुनने मिलते हैं जो अतार्किक लगते हैं। सदस्य1: क्या आक्षेप?? देखो आप तो खुल कर बोलो यहां। मैं: सर एक सुना था कि पुष्यमित्र ही राम हैं.... सदस्य2 : अच्छा पुष्यमित्र ने अश्वमेध भी किए थे वो किस अभिलेख से पता चलता है?? मैं: सर धनदेव का अयोध्या लेख सदस्य2 : ठीक ठीक सदस्य1: सोनिया आप तो साफ साफ बोलो कि पुष्यमित्र ने एक कमज़ोर शासक को हटा कर सशक्त साम्राज्य की स्थापना की थी इसीलिए आपको पसंद है! मैं: सर वो तो है ही! तीसरा कारण यही था!! ( फिर तीनों ने एक दूसरे को देखा मैंने तीनों को देखा) सम्माननीय जी: सोनिया आपका साक्षात्कार हो गया मैं: ( बेवकूफों जैसे) हो गया सर? तीनों ने हंस कर कहा "हां हां हो गया आप जा सकती हैं !!" मैं: धन्यवाद सर! आप सभी का दिन शुभ हो तीनों: आपका भी सोनिया जी!!