मार्च 02, 2017

कमरे में “घर”


कमरे में “घर

 वो सुबह भी तब तक आम सुबहों जैसी ही थी जब तक मैंने यह देख न लिया कि मेरे कमरे की खिड़की को किसी चिड़िया ने अपने सुंदर घोंसले से नवाज़ा है .फिर तो सुबह के साथ मेरा पूरा दिन ही खास बन गया. बात यहीं पर नही रुकी ,अभी कुदरत के पास मुझे देने के लिए एक और नाय़ाब तोहफा  था.


शाम को मैंने पाया कि वो घोंसला आबाद हो चुका है . अब उसमें एक छोटा-सा अंडा भी था. ये सब कुछ किसी सपने को छू लेने जैसा था. हमेशा सोचा करती थी कि कितना अच्छा हो अगर तमाम पंछियों, तितलियों और फ़ुदकती गिलहरियों को समझाया जा सके कि सब इंसान उनके दुश्मन नहीं हैं.
शायद आज किसी ने समझा दिया था......नतीजतन चिड़िया मेरी दोस्त थी .

बँटी हुई दुनिया.. डरे हुए लोग......

मैंने अपने घरवालों के साथ जब ये अनोखा दोस्ताना बाँटना चाहा तो तब  मुझे बताया गया कि मेरी दोस्त चिड़िया दरअसल एक होल्गी है जिसे स्थानीय लोक-व्यवहार में दुर्भाग्य और दरिद्रता का प्रतीक माना जाता है . और जिस लहजे में ये सब कहा गया वह कुछ ऐसा था कि इसे तो चिड़िया भी कहलाने का हक नही है.               
            काश ! चिड़ियों को हमारी बोली समझ न आती हो. बेशक हम घोंसलों में नही रहते पर हमारी सोच फूस जैसी ही है....हल्की...बेमोल..और बेबुनियाद-सी...यहाँ-वहाँ उड़ती हुई.
खैर....कोई कुछ भी मानता रहे मेरे लिए तो प्यारी होल्गी ने एक अलग ही किस्म की ख़ुशी का खज़ाना खोल दिया था इसलिए मैं उसकी मेजबानी में जुट गई. झटपट मिटटी के सकोरों में चावल और पानी भर, चुपके से खिड़की में उन्हें रखने को मैंने हाथ बढ़ाया ही था कि चिड़ियारानी फुर्र से उड़ गई. 
शायद उसे एकाएक इतना बहनापा पसंद नहीं आया.
 परिंदे ऊंचाई से दुनिया को देखते-परखते हैं और सारे सच जान लेते हैं, शायद इसीलिए इतने सयाने होते हैं . उनका देखना सूरज की रौशनी जैसा है और हमारा मोमबत्ती के उजाले सा....तभी तो हम अक्सर चोट खाते हैं...झूठों में ही जीते हुए सारी ज़िन्दगी गुज़ार देते हैं. 

हम खातेनहीं चुगतेहैं..
कुछ देर अपनी चिड़िया का इंतज़ार करने के बाद मुझे समझ आया कि मेरा दावत देने का तरीका सही नहीं था उससे ज़रूर चिडिया को इंसानी बू आई होगी. मैंने भूल सुधारी और मिट्टी के दिये में से कुछ चावल लेकर बिखेर दिए. मेरा ये “प्राकृतिक” तरीका मेहमान को पसंद भी आया. पहले तो उसने कुछ देर दानों की पड़ताल की फिर धीरे से अपनी चोंच में एक दाना उठाया
...और सबसे अच्छी बात ये कि मैं इस बेहतरीन वाकये का फोटो भी एकदम सही वक्त पर ले पाई.
           हम दोनों खुश थे...एक खा कर और दूसरा खिलाकर !
अभी कुछ देर पहले ही मैं सपने बुन रही थी कि चिड़िया के घोंसले पर धूप न आये ऐसा कुछ करुँगी, कल चुपके से कुछ रुई वगैरह खिड़की मे रख दूँगी ताकि चिड़िया अपने घोंसले को आरामदेह बना सके और भी न जाने क्या-क्या...लेकिन अभी जो हुआ उसने मुझे सिखाया कि किसी की मदद उसकी ज़रूरतों को अपने ढंग से पूरा करके नहीं की जा सकती. हम सब अपने नज़रिये को ही सच मान बैठते हैं . चिड़िया के लिए भी इंसानों जैसा घर बनाना चाहते हैं . गाँवों के सवाल, शहरों के जवाबों से  सुलझाने की कोशिश करते हैं. अधिकांश सरकारी योजनाएँ भी वांछित सुविधा दे पाने में शायद इसीलिए विफल हो जाती हैं क्योंकि वे अपने लक्ष्य-समूह के स्तर और असली ज़रूरतों के बजाय योजना-निर्माताओं की समझ के अनुसार बनाई जाती हैं.
               जो दाना “चुगते” हैं, उन्हें दाना “खिलाया” कैसे जा सकता है..?


प्रेम करुणा मांगता है...
प्रेम, करुणा मांगता है....पढ़ा था कहीं...आज समझ भी आ गया.
               मेरी दोस्त चिड़िया, जिसने मुझे कुदरत के इतने सुंदर पहलू को इतनी पास से देखने का मौका दिया, आज मेरे कारण त्रासदी देख रही है.
           हुआ कुछ यूँ कि दो-चार दिनों में मैं उससे इतना घुल-मिल गई थी कि मन करता था बस वहीँ खिड़की के पास बैठ उसे देखती रहूँ. मैंने मन का किया भी.... और लगभग पूरे दिन उसकी गतिविधियाँ देखती रही. रोज़ उसका साथी चिड़ा आकर थोड़ी-थोड़ी देर के लिए उसे छुट्टी दे दिया करता था लेकिन आज उसका सुबह से कोई अता-पता न था. चिड़िया बार-बार उठती, कुछ चहलकदमी करती और अपनी स्थिति बदल कर फिर बैठ जाती . न जाने क्यों अचानक ही मुझे महसूस हुआ कि ये प्यारी कब से यहाँ ऐसे ही अपना अंडा से रही है इसे ज़रूर प्यास लगी होगी. मेरे दिमाग ने तो कहा कि अगर मैंने पानी रखने के लिये खिड़की खोली तो ये चिड़िया डर जाएगी लेकिन मन को उसकी प्यास (?) के आगे कुछ दीखता ही नहीं था. एक बार फिर मन जीत गया और मैंने खिड़की खोल दी.    
अब पता लगा कि दिमाग ही सही था...चिड़िया डरी और उड़ गई...कहीं इतनी दूर कि फिर दो दिनों तक लौटी ही नहीं. मैं बेहद शर्मिंदा थी....खुद पर गुस्सा भी खूब आया लेकिन सब बेमतलब था . अब एक अजन्मा अकेला था . मैं चिड़िया का इंतज़ार करती रही . मुझे विश्वास था कि वह ज़रूर आएगी . वो आई भी लेकिन उसके बाद जो हुआ वो अप्रत्याशित था.

पूरे दो दिन बाद अपने घोंसले मे लौटी चिड़िया पहले तो आकर खिड़की की सलाखों पर बैठी रही फिर नीचे उतरी और अपने घोंसले को देखने लगी. मन तो फिर से अति-उत्साहित हो उठा. मैंने बिना चूके फोन उठाया और तस्वीरें लेने लगी.  लेकिन चूँकि मैं अपनी पिछली गलती दोहराना नहीं चाहती थी इसलिए इस बार दिमाग को मौका दिया . मैं कमरे से बाहर आ गई ताकि चिड़िया अपनी सुरक्षा के प्रति आश्वस्त हो जाए. जब कुछ देर बाद मैं वापस कमरे में आई तो देखा चिड़िया फिर नदारद थी!!!
 बस वो फिर कभी नहीं आई. अगले सात-आठ दिनों तक वह अंडा ऐसे ही पड़ा रहा. मैंने मुंशी जी की कहानी “नादान दोस्त” पढ़ रखी थी इसलिए अंडे को छूने तो क्या उस ओर की खिड़की खोलने से भी परहेज कर रही थी. मैं बस अंडे को शीशे से देखती रही और एक दिन वो वहाँ से गायब हो गया. इस पूरे दुखद घटनाक्रम में सबसे बड़ी अपराधी होने का पश्चाताप और अंडे की दुर्गति का दुःख तो मेरे साथ हमेशा बना रहने वाला था ही लेकिन एक और सवाल मेरे में था कि वो चिड़िया केवल ‘डरी हुई माँ’ थी या कोई ‘निष्ठुर माँ’...?
             ये गुत्थी इंटरनेट से जानकारी जुटाकर मैंने कुछ ऐसे सुलझाई -
“सबसे पहली बात कि अंग्रजी में होल्गी को “laughing dove” कहा जाता है जो एक तरह का छोटा कबूतर है. पता लगा कि दुनिया में मेरी तरह और भी लोग हैं जो इसी पक्षी के ऐसे ही व्यवहार से चिंतित हैं. मेरे मन का काँटा दूर हो गया जब मैंने पढ़ा कि होल्गी, मनुष्य से इतना ज़्यादा नहीं डरती कि अपना घोंसला छोड़ चली जाए. इसके पीछे कुछ और कारण हो सकते हैं जैसे यह कि ऐसा प्रायः होता है यदि नर लाफिंग डव, मादा पक्षी को छोडकर चला जाए तो वह भी अपने अंडे को छोड़कर चली जाती है. चूँकि अकेले एक पक्षी का पालन कर पाना कबूतरों के लिए मुश्किल होता है इसलिए इस कृत्य को निष्ठुर कहा जाना गलत होगा. इसके अलावा होल्गी ऐसा तब भी करती है जब उसका अंडा ख़राब हो गया हो. अंडे के ख़राब होने के कई कारणों में से एक धूप की अधिकता मेरी खिड़की में मौजूद था.”
          इस तरह न तो वो डरी हुई और न ही निर्दयी माता थी ....यह एक प्राकृतिक घटना थी जो होल्गी के साथ आमतौर पर घटित होती रहती है लेकिन मेरे लिए ये बेहद ख़ास...हल्की-सी टीस घुली-मिली...याद है जो मैं कभी भुला नहीं पाऊँगी.
......इन्सान बनते पक्षी !!
बड़ा बुरा लगा जब होल्गी का खाली पड़ा घोंसला देखने कई पक्षी आये और चले गये कोई उसे अपनाने को तैयार न था. यदि प्रकृति का मानवीकरण करके देखूँ तो यह कुछ ऐसा था जैसे मकान आदि में कोई मौत या हादसा हो जाने पर लोग उसे अपशकुनी मानते हैं और उसे किराये से लेने में भी हिचकिचाते हैं. क्या पक्षी भी अन्धविश्वासी बन गए हैं...?
                एक दिन तेज़ हवा चली और वो घोंसला तितर-बितर हो गया तब कुछ पक्षी आए और कई सारे बिखरे तिनके बटोर कर ले गये. जैसे  खाद्य से भरे ट्रक के रोड पर उलट जाने पर आस-पास के लोग सब लूट कर ले जाया करते हैं.
       और कुछ नहीं...शायद पक्षी भी इन्सान हो चले हैं..!!!
चलती का नाम...ज़िन्दगी!!
 मुझे दुखांत पसंद नहीं. शायद कुदरत को भी नही इसीलिए देखिये फिर सुख आ गया.....
 भयंकर गर्मी के बाद मानसून की दस्तक के साथ मेरी खिड़की से लगे जामुन के पेड़ पर पक्षियों की आवाजाही फिर शुरू हो गई है. पक्षी आते हैं, कुछ देर खिड़की में बैठते हैं और इससे पहले कि मैं उन्हें तस्वीर में कैद कर पाऊँ; उड़ जाते हैं. ये छोटी चिड़िया अक्सर आती है और खिड़की में कमरे की ओर मुँह करके बैठ जाती है. दरअसल खिड़की का काँच एक वन-वे मिरर है जिसमें दिन में बाहर से देखने वाले को अपना ही अक्स दिखाई देता है. ये छूटकू यही खेल करती रहती है.
                      वो खुद को देख खुश होती है और मैं उसको .
आखिरकार एक दिन उसने मुझे मौका दे ही दिया और मैंने ये सुन्दर फोटो लिया. क्या ये आसमान में कोई बादल खोज उसे छूने की फ़िराक में है?

इसी तरह दिनभर चहचहातीं चिड़ियों के बीच एक दिन मुझे कुछ अलग-सा सुनाई पड़ा. मैंने देखा कि मेरे कमरे से नीचे जाती सीढ़ियों में बनी खिड़की में तीन पंछी सर जोड़े बेहिसाब चीं-चीं कर रहे हैं. उनमें दो एक जैसे थे और तीसरा अलग. कहने की बात ही नहीं के मेरे नीचे जाने से हुई आहट सुन वो तीनों उड़ कर पेड़ पर जा बैठे लेकिन उनकी बातें वैसे ही जारी थीं.
मैं उन्हें देखती रही...और अपनी आदत से मजबूर ...वही मानवीकरण करने लगी... कुछ यूँ कि ये दोनों एक से दिखने वाले नर और मादा पंछी घोंसला बनाने के लिए जगह की तलाश में हैं और ये तीसरा है “ब्रोकर”....इन्हें इस जगह कि खूबियाँ बता रहा होगा...!! 
थोड़ी देर बाद वे वहाँ से चले गये. मैंने सोचा सौदा नहीं पटा..!!
लेकिन करीब एक घंटे बाद फिर वैसा ही शोर उसी खिड़की पर होने लगा. मैं ऊपर से दबे पाँव नीचे आती तब तक वो शोर घर के अन्दर वाली खिड़की पर पहुँच गया था ....उसके पीछे-पीछे में भी..!! इस बार “ब्रोकर” साहब साथ नहीं थे. बस ये दोनों ही थे.
मैंने तुरंत  इंटरनेट से पता किया कि ये “काबर” पक्षी है “Common Mynah”....!! इसके अलावा एक अचम्भित करने वाली जानकारी मिली कि ये नन्हीं शैतान चिड़िया विश्व की तीन सबसे अधिक आक्रामक पक्षी-प्रजातियों में शामिल है.
इन दोनों के कुछ खास मिज़ाज़ हैं . एक को कमरे वाली खिड़की पसंद है दूसरे को सीढ़ी वाली.  
मुझे लगता है कि चिड़िया सीढ़ी वाली खिड़की में रहने की ज़िद करती है लेकिन चिड़ा बार-बार कमरे वाली खिड़की में आ जाता है. वैसे एक बात जानकर मैं बेहद खुश हूँ कि ये मैना पक्षी हमेशा जोड़े में ही रहते हैं और वो भी पूरे जीवन एक ही साथी के साथ और हाँ... अपने बच्चों की देखभाल बड़े चाव से मिलकर करते हैं यानी अब कम-से-कम होल्गी वाली त्रासदी का दोहराव तो नहीं ही होगा.
आजकल इनका बस यही काम है...नियमित रूप से दोनों खिड़कियों पर आना, बैठना और खूब बतियाना. इन्हें देखना बड़ा मजेदार है. कभी खिड़की के काँच पर
चोंच मारकर देखते हैं तो कभी उसमें अपने को देखकर शरीर फुला लेते हैं. मैं इंतज़ार में हूँ कि कब इनकी लड़ाई सुलझे और ये घोंसला बनाएँ. लेकिन पापा कहते हैं कि ये दोनों आलसी हैं, घोंसला बनाना ही नहीं चाहते. कौन जाने क्या है उनके मन में....अब भी दोनों चिल्ल-पौं मचा रहे हैं .
गुलज़ार साहब की ये त्रिवेणी इन पर एकदम सही बैठती है-
       “आओ ज़बानें बाँट लें अपनी-अपनी हम.
              न तुम सुनोगे बात, न हमको समझना है.                            दो अनपढ़ों की कितनी मोहब्बत है अदब से...”