नवंबर 10, 2017

इतिहास “देखना”...


 ...कुछ डरों की बरामदगी...वाया मोहेंजो दारो”!!


मोहेंजो दारोदेखी......(मेरे ख्याल से ये बताना या ऐसी कोई भूमिका रखना कि मोहेंजो दारो एक फिल्म है बड़ा ही आउट-डेटेड काम होगा. आजकल सबको सबकुछ पता होता है. अब वो वक्त नही रहा जब मेरे कहने पर कि मैंने कल हैरी पॉटर देखी..मेरी सहेलियाँ मुझे ऐसे देखें जैसे मैंने पश्तो में कुछ कह दिया हो....क्योंकि मुझे यकीन है कि आज वो सहेलियाँ भी “F.R.I.E.N.D.S.” या “Game of Thrones” से नीचे तो बात भी नहीं करती होंगीं) ....और जब से देखी है मन में आईं बातें; शब्दों में बदलने को कुलबुलाये जा रही हैं. फ़िल्में मैं खूब देखती हूँ लेकिन सब पर लिखने की तबियत नहीं होती. ये तो इतिहास की ओर रुझान है जो मुझसे कुछ लिखवा पा रहा है.
डर...इतिहास के गुम हो जाने का..!
अक्सर मुझे ऐतिहासिक पृष्ठभूमि पर बनी फिल्में,सीरियल आदि देखने में उकताहट होती है.कारण वही कि इतिहास में अब तक जो पढ़ा है उससे इन तमाशों का साम्य बिठा पाना जरा मुश्किल लगता है. आज आप चार लोगों के बीच कहिये कि जोधा, अकबर की नहीं बल्कि जहाँगीर की रानी थी, तुरंत आपकी डिग्री फर्ज़ी करार दे दी जाएगी...भई! क्यों नहीं...सबने जोधा-अकबर फ़िल्म जो देखी है...टीवी सीरियल की तो पूछिये ही नहीं. 'माहम अनगा '  को तो इतिहासकारों से ज्यादा आजकल आंटी-लोग जानती हैं...!!
        अपने फायदे के लिए फिल्मी लोग इतिहास को खूब भुनाते हैं.... हाल ही में पद्मावतीफिल्म पर गज़ब का विवाद उठा. अगर मैं कह दूँ अलाउद्दीन खिलजी का पद्मावती कनेक्शन इतिहास में कहीं नहीं मिलता. यकीनन खिलजी ने चित्तौड़ पर हमला किया था पर ये जो पद्मावती वाली कहानी है दरअसल खिलजी के जाने के तकरीबन सौ साल बाद जायसी ने पद्मावतनाम से लिखी थी जो विशुद्ध साहित्यिक रचना हैऐतिहासिक नहीं...तो लोग झट से बोर हो जाएंगे...(आप भी हो गये ..?) 
           अब अगर ऐसे दर्शकों के लिए भंसाली साहब खिलजी के चित्तौड़ पर हमला करने के असली कारणों पर फिल्म बनाएँ तो उसका फ्लॉप होना तो तय ही है. चूँकि कोई भी फ़िल्मकार खुद इतिहास नहीं बनना चाहता इसलिए बेचारे इतिहास को ही कोम्प्रोमाईज़ करवा दिया जाता है.

डर...कल्पनाओं की कमाई लुटने का !!
जब हम कुछ पढ़ते या सुनते हैं तो मन में उसकी कल्पना भी करते जाते हैं.किरदारों को शक्लें देते हैं.मन ही मन नई दुनिया बसाते हैं...पर ये हिस्टोरिकल ड्रामे सब कचरा कर देते हैं जैसे महाभारत-रामायण सीरियलों को ही ले लीजिये. राम कहने भर से अधिकतर लोगों के मन में अरुण गोविल का चेहरा घूम जाता है....कृष्ण के लिए नीतीश भारद्वाज....तो भीष्म पितामह के लिए मुकेश खन्ना का... ( जो लोग महाभारत-रामायण को हिस्ट्री का हिस्सा मानते हों उनके लिए दो मिनट के मौन के बाद आगे की लाइन्स लिख रही हूँहाँ, अकबर के लिए थोड़ा कन्फ्यूजन रहता है कि ऋतिक या रजत टोकस पर बाजीराव के लिए तो बस रनबीर सिंह...है !!
      वैसे इसमें कोई बुराई वाली बात तो नहीं है लेकिन मेरे जैसे कुछ लोगों के लिए कल्पनाएँमौलिकता और कुछ रचने की ताकत ही दौलत है जिसका छिनना मानो बिलकुल गरीब कर जाता है. मसला बस यही है. मोहेंजो दारो देखने को मैं बेहद उतावली थी.कारण था उसका इतिहास से जुड़ा होना (मुझे बचपन से ही इतिहास पसंद था क्योंकि हिंदी के अलावा यही विषय था जिसमें कहानियां हुआ करती थीं....लेकिन फिर दूसरे बच्चों के जैसे ही मेरे भी ज्ञान-चक्षु खुले कि विज्ञान ही रोज़गार की नैया पार लगायेगा” ....और बस बाकी सब बेकार का बोझा लगने लगा...वो तो बाद में विज्ञान ने जो बारहवीं तक ऐसा रूखा बर्ताव किया कि मैं वापस इतिहास के पास लौट आई लेकिन इस फ़िल्म ने भी यही किया...
मोहेंजो दारो याअग़्रबाह”...??
इस फिल्म को देखकर मन में मोहेंजोदड़ो की जगह अग़्रबाह याद आता है. अग़्रबाह..? अरे! वही.. अपने अलादीन का देश...!! कार्टून भूल गये क्या? देखिए ये रहा...
आगे की तस्वीरों में ऊपर वाली मोहेंजो दारो फिल्म की हैं और उसके ठीक नीचे अलादीन कार्टून की...
फ़िल्म में दिखाया गया बाज़ार और अपने कार्टून वाला एक जैसे दिखाई देते हैं. 
आप ही देखिये कितना मिलता-जुलता है न सबकुछ...? 
चाहे ये दो इमारतों को जोड़ने वाले पुल हों या उनके बीच लगे शामियाने....!!
लगता है कि गोवारिकर अंकल ने सिन्धु घाटी के बारे में पढ़ने के बजाय अलादीन कार्टून देखकर फिल्म बना डाली. इस तरह फिल्म का सेट तो बन गया पर कहानी कौन बनाता...? तो फिर अंकल पहुँचे भगवान श्रीकृष्ण की शरण में और चुपके से उन्ही की कहानी उठा लाए...! (कृष्ण, गोकुल के गाँव से मथुरा जैसे शहर में आ, क्रूर राजा की सत्ता उखाड़ फ़ेंकते हैं. फिल्म का सरमन भी कुछ ऐसी ही नियति लिखवा कर लाया दीखता है ) ज़रा सोचियेगा तो समझ जाइएगा.                
        खैर..कुछेक चीजें अंकल ने सही भी की हैं, जैसे सिन्धुघाटी से मिली त्रिफुलिया शॉल वाले पुरोहित की मूर्ति को साकार कर दिया...हिरोईन के वो खूबसूरत मुकुटनुमा गहने जो सिन्धुघाटी से मिली मृण्मूर्तियों को देख के बनाए गये हैं-
इसके लिए गोवारिकर जी “लख लख थोरा ” (माने थैंक यू..जैसा कि मोहेंजो दारो में लोग कहते हैं )

लेकिन आपके पास मौका था...चाहते तो लासानी फिल्म बना सकते थे जिसमें हीरो-विलेन और दबे-कुचले लोगों के घिसे-पिटे किस्सों से इतर एक अनूठे समाज की जादुई कहानी होती....
आप चूक गए!!
सारे डर बरकरार हैं...
                                                        -विशिष्टा ©