नानी के घर की बात है जहां उस वक्त नाना नानी नहीं थे। दीदी हॉल में टीवी देख रही थी। मुझसे बोली -"तू अंदर जा अब "वो" आएगा।" (एक आदर्श अग्रजा के जैसे चिढ़ाने वाली तू बेवकूफ है वाली नज़रों से देखते हुए)
मैं - "कौन?"
दीदी - "वो... और नहीं गई तो फिर बाद में जाने नहीं दूंगी।" (मेरी गर्दन में अपनी बांह लपेटते हुए)
मैं -"हम नहीं जाएंगे जी!" ( एक आदर्श अनुजा की तरह आपका राज है क्या वाले ढीठपन से)
फिर टीवी पर डरावने जोकर वाला हॉरर शो "वो" शुरू हुआ।
दीदी ने अब और कसकर पकड़ लिया...बोली- "अब देख... पूरा देख...!" मैंने रोए रोए ब्रह्मास्त्र फेंका- "मम्म्मी दीदी भूत दिखा रही हैं"। दीदी ने एक विजेता जैसे मुझे धकिया के छोड़ दिया।
फिर वहां से मैं चली एक नया कारनामा करने। मामा हॉल में सोए थे। मम्मी और उनकी बुआ अंदर वाले कमरे में थे। पांच छः साल की मुझ खुराफ़ाती बच्ची से बेखबर उन सबकी दुपहरी में भगदड़ मचने वाली थी।
कुछ देर बाद मेरे रोने की आवाज़ से सब घबराए हुए दौड़े आए ।
"मैंने कान में मोती डाल लिया" चिल्ला चिल्ला कर मैं रो रही थी। किसी ने 'कौन से मोती... कहां से मिले तुझे!?' जैसे गैर-ज़रूरी सवाल दागे। हर खतरनाक चीज़ बच्चों के हत्थे चढ़ ही जाती है या ये कहें कि हर चीज़ को वो खतरनाक बना लेते हैं)
तत्काल मम्मी के दो चांटे प्राप्त हुए। ( मां के लिए 101 नुस्खे नामक किताब में पहला नियम यही है कि कोई भी बात हो सर्वप्रथम संतान को थपेड़ देवें) बुआनानी ने उनसे मुझे बचाया कि तब तक मामा भी उठ कर आ गए।
मामा किसी सर्जन की तरह हाथ आगे किए बोले - "दीदी कैंची लाओ" फिर सधे हाथ से कैंची कान में डालकर मोती खींच लाए। समझाने लगे कि ऐसे कान में कुछ नहीं डालना चाहिए वर्ना कान काटना पड़ता है इत्यादि....! जबकि मम्मी के मुताबिक खुद इन मामा ने छुटपन में कान में गेहूं डाल लिए थे और डॉ को दिखाने पर पता लगा था कि उस कान में तो पहले से ही स्लेट-पेंसिल मौजूद है। खैर मैंने राहत की सांस लेते ही मामा से कहा -"दो मोती आपके भी कान में डाले थे।"