पिछले पन्ने पर "खुशबूदार यादें" सहेजने को तैयार मैंने सोचा था क्या कि अगले पन्ने पर ये लिखना पड़ेगा ? आज पूरे तीस दिन हो चले हैं... मेरी "घ्राण शक्ति" के चले जाने के । कारण... वही .. प्रारब्धों का हिसाब करने आया कोरोना वायरस ।' सूंघ न पाना' भी एक विकलांगता है।
बारिश आई... मिट्टी की सौंधी गंध न हासिल हुई। चम्पा के, बड़े दिल से लगाए पेड़ पर फूल आए पर खुशबू न आई। अब तक पर आम की वो मोहक महक नहीं मिली जिससे गरमी के मौसम का अहसास मुकम्मल हुआ करता था। किसी मन्दिर में होने का अहसास कराने वाले 'तुलसी' और 'दौणा', बिना खुशबू के बस 'हरे पत्ते' बन कर रह गए हैं। एक प्याली चाय में आधा किलो अदरख डाल दें तो भी वो ताज़गी नदारद रहती है । मतलब अदरख का स्वाद बिना उसकी तीखी गंध के बन्दर तो क्या इंसान को
भी नहीं आता ।
सबसे ज़्यादा तो दुःख इस बात का है कि अब मैं उस " सांकरी खोर" तक जा कर भी वो दूध-दही की खुशबू नहीं ले पाऊंगी जहाँ श्री कृष्ण ने चंद्रावली की मटकी फोड़ी । "सांकरी खोर" अपने आप में इस बात की पुष्टि करती है कि "खुशबुएं", यादों के कैप्सूल्स हैं, हज़ारों साल पहले यादों के घटे लीलाक्रम को एक बार फिर से अनुभूत करवा देने वाले।
जाने कब खत्म होगी ये "घ्राण संवेदनहीनता"....!!