नवंबर 27, 2024

जो घटी नहीं!

प्रश्न:  "क्या कोई ऐसी याद हो सकती है जो अब तक घटी न हो ...?"
उत्तर: "उसे याद नहीं 'चाह' कहते हैं।"
ठीक। फिर कुछ 'यादनुमा चाहतें' जो घटी नहीं पर घटी-सी लगती हैं।
    अलसाई दोपहर। जून का तपिश हटाता नम महीना। बाहर हल्के बादल। दूर कहीं बारिश जिसकी ख़बर मुझे मिट्टी की सौंधी महक ने आ कर दे रखी है। मैं बड़ी-सी खिड़की के पास बैठी कहानी की किताब में गुम हूँ। घर में कुछ लोग हैं पर सब सो रहे हैं। अचानक बूंदा बांदी की शुरुआत... मेरी किताब के पत्ते पर एक बूंद गिरती और तुरंत सोख ली जाती है.... मैं गाती हूं.... 'बदरा....' । ऊपर गड़‌गड़ाहट जारी है। लगता है जैसे कुछ बेहद अच्छा होने वाला है। थोड़ी खड़‌खड़ाहट शुरु हो गई घर में है। कोई तो जागा है। मुझे अच्छा लगता है। मैं एकान्त प्रिय नहीं हूं। कोई मिलेगा बतियाने को। चाय में उबलती अदरख पूरा माहौल बना रही है। मुझे थोड़ी ठण्ड महसूस होती है। बीती सर्दी में, गर्मी की आहट आते ही दफ़न कर दिए गए बिस्तरों में से एक हल्का कम्बल ले आती हूँ। चाय तैयार है। कप में छनने की आवाज़ जैसे छतों में भरा पानी निकास पाईप से नीचे गढ्‌ढा करता गिर रहा हो। एक एक करके सभी जाग चुके हैं।
हर कोई इस बड़ी खिड़की से आते मौसम में डूबना चाहता है। सामूहिकता में सुकून है। बारिश अब ज़ोर पकड़ने लगी है। । चाय आ चुकी है। चुस्कियों में सब मौसम पीते हैं। बाहर अब देखने जैसा कुछ खास नहीं है। पक्षी भीगे भीगे से एक कतार में तारों, छज्जों पर बैठे हैं। एक ठहराव है। बारिश के पानी में घुल घुल बहती मिट्टी में भी । चाय के प्याले ले जाए जा चुके हैं। बात, शाम के खाने में क्या बने के राष्ट्रीय यक्ष-प्रश्न पर चल रही है। किताब मोड़ कर बगल में रख दी गई है। अचानक कोई कुछ गुनगुना उठता है.... अब बातचीत का रुख सुरीला है। कोई नहीं चाहता कि ये सिलसिला खत्म हो....। बैठकी का आनन्द । सबको पता है  उठना पड़ेगा। फ्रिज में पड़े बासी आम न खाने की शिकायत नेपथ्य से आती है। अब आम नहीं, गरम भुनी मूंगफली खानी है सबको।