अगस्त 23, 2025

रिज़ल्ट वाली पीडीएफ

 ...और रोज़ अलां फलां पीडीएफ खोलती पढ़ती मेरी आंखों के आगे अचानक एक दिन रिज़ल्ट वाली पीडीएफ आ खुलती है..! 
     सुन्न शरीर में दिल ऐसे थर्राता है जैसे आइडलिंग में गाड़ी का इंजन ! उस पल में मेरी "जब रिज़ल्ट आएगा तो ये करेंगे" वाली सारी योजनाएं दिमाग के कूड़ेदान में जा कूदती हैं। 
 सालों की मेहनत, आशाओं और आकांक्षाओं का एक पहाड़ किसी नन्हें उत्साही बच्चे जैसे मेरे कंधे पर रिज़ल्ट देखने झूल जाता है जिसे मैं कतई निराश नहीं करना चाहती। 
   जी चाहता है कि कोई और देख कर बता दे कि नाम या नहीं! लेकिन कोई आता नहींआता है केवल "कोई नहीं... घबराओ नहीं.... खोलो... देखो...क्या हुआ...नहीं हुआ क्या... " का शोर। 
   अपने कोने कोने से हिम्मत खुरच पुरच कर मैं वो फाइल खोलती हूं। फाइंड इन पेज में अपने नाम का पहला अक्षर टाईप करने में मन घबराता है कहीं नॉट फाउंड आ गया तो...! लेकिन ऐसे तो होता नहीं कि अपनी राशि में सभी की किस्मत खराब हो इसलिए कुछेक रिज़ल्ट तो दिख ही जाते हैं...दूसरा अक्षर लिखना छोड़ उन्हीं हाईलाइटेड नामों में अपना नाम खोजती हूं...
   ....आंखो के आगे अंधेरा सा छाने ही लगता है कि फिर दूसरों के नामों के काले बादलों को पीछे धकिया मेरे नाम का चंद्रमा जगमगा उठता है.... 

 

जीवन एकाएक उजला हो जाता है। 

मेरे होंट बुदबुदाते हैं "मम्मी मेरा सिलेक्शन हो गया" ये बहुप्रतीक्षित शब्द सुन मां का चेहरा खिल उठता है, हाथ श्रद्धा में जुड़ जाते हैं और आँखों में खुशी का सैलाब उमड़ आता है....प्रायः मंदहास्य दीदी हँसती हुई आ कर मुझे गले लगा लेती हैं। पास खड़ी मामीजी को अपना फ़ोन थमा मैं रिज़ल्ट फिर एक बार चेक कर लेने को कहती हूं। उनके आश्वस्त कर देने पर मन शांत हो जाता है। 

    अंदर उमड़ रहे भाव इतने विचित्र हैं कि उन्हें एक शब्द में पिरोया जाना कठिन है। वैसी राहत... जैसे नंगे पैर तपती छत को पार करके छांव में पहुंच कर लगता है। वैसा आराम जैसे किसी अनचाहे थकाऊ सफ़र से घर लौट कर लगता है। रोमांच उतना, जितना कोलंबस झूले की सवारी में आता है...एक पल में आसमान छू अगले में तेज़ी से नीचे आना। फिर बधाईयां सब भावों को पार्विक उत्साह में डूबो देती है। 
   ये कुछ एमबी की फाइल जैसे कोई दरवाज़ा है जिसके खुलते ही मैं किसी एक नई दुनिया में दाखिल हो गई हूं....
      अब बिना सिलेबस के पाश में बंधे मन कहे वो किताबें पढ़ पाऊंगी। तथ्य जुटाने या आंकड़े रटने के दबाव से मुक्त अब अख़बार मनोरंजक लगेगा। जब मन चाहे जितना चाहे उतना फिल्में निपटाऊंगी वो भी गिल्ट फ्री अब लो टू हाई फिल्टर बिना विंडो शॉपिंग होगी। अब मेरे लिए भी रविवार, छुट्टी का दिन हुआ करेगा। मेरे द्वारा भी सर्विस बुक, सी एल, ग्रेच्युटी, आईटीआर जैसे शब्द धड़ल्ले से प्रयोग में लाए जा सकेंगे। सबसे बड़ा सुख तो ये कि किसी के "आजकल क्या कर रही हो?" पूछने पर हकबकाना नहीं पड़ेगा। 
    गंतव्य तो क्या एक भुलावा है। यात्रा ही वास्तविकता। ये रिज़ल्ट वाली शाम एक नई सड़क है। गड्ड मड्ड रास्तों, धूल भरी पगडंडियों में गिरते सम्हलते यहां तक आ पहुंची हूं। शाम ढल रही है मैं चल रही हूं....

फ़रवरी 21, 2025

साक्षात्कारस्य प्रथम दिवसे

घर

वो सुबह खास थी। रात भर नींद नहीं आई थी। लेकिन उठने पर लगा नहीं कि सोई नहीं। एक डरावना सपना आया था कि मुझे आदरणीय जी का बोर्ड मिला है और वे धड़ाधड़ प्रश्न पूछ रहे हैं लेकिन मुझे एक भी नहीं आ रहा और मैं हँस रही हूं...!! मैंने अपनी माताजी को नहीं बताया.... खुद से भी कहा भूल जाओ!! बस सब ऐसे ही चला। सूट पहनना तय था तो तैयार होने में वक्त ही नहीं लगा। माताजी के बताए अनुसार श्री शंकर देव का पूजन किया, उस दौरान मैंने "शिव मानस पूजा", "रुद्राष्टकम" गा लिए... एक "द्वादश ज्योतिर्लिंग स्तोत्र" ही बचा था... जो बाद में गाने को मिला!! फिर दीदी ने थोड़ा बनाया सॅंवारा , माता जी ने पुचकारा और बैग तैयार किया। बैग तो ऐसा था मेरा जैसे पिकनिक पर जा रही होऊॅं! फिर मुझे विदा करते समय मैं , दीदी और माता जी एक पल के भी आधे पल में कुछ भावुक हो गए। बिना बोले जैसे बोल रहे थे कि इतने सालों के संघर्ष की यात्रा है जो ये आज उसका आखिरी पड़ाव आया है... या ये कि इसके बाद और चलना पड़ेगा...!! फिर मैं , पापा और नीलमणि चल दिए आयोग की ओर...! रास्ते में चाहा हनुमान चालीसा सुन ली जाए।आखिर सारी शक्ति वही तो देते हैं! चालीसा पूरी होने से पहले ही आयोग आ गया...!

आयोग के बाहर

माहौल था वहां पूरा....!!! सूट बूट से लैस लड़के... सुंदर प्यारी सारी लड़कियाॅं... मैं गाड़ी में ही बैठे बैठे उन्हें देख रही थी। हम सारे यूं तो एक दूजे के प्रतिद्वंद्वी हैं लेकिन क्या एक अदृश्य डोर नहीं है जो हमको बाँध कर एक कुटुम्ब बनाती है?! परीक्षा की तारीख आने से ले कर आज तक जो जो बीता है हम सबने एक साथ महसूस किया है। हमारे बीच ऐसा कुछ साझा है जो हमारे अपने भी समझ नहीं सके होंगे। तो मुझे तो बेहद अपनापा लग रहा था इन सबसे!! फिर एंट्री शुरू हुई। अंदर लंबी लाईन लगी थी। ये वो वक्त है जब आप उन सबसे मुखातिब होते हैं जिनके स्कोर को ले कर आप दिन रात सोच रहे होते हैं। मैं ही थी जिसने सूट पहना था। फैसले से नाखुश भी नहीं थी।

आयोग के भीतर

सबसे पहले कतार में लग मोबाईल फोन जमा करने की कवायद शुरू हुई। मुझे बेहद आश्चर्य हुआ (और ज़ाहिर तौर पर गुस्सा तो ऐसा आया के आदरणीय जी का बोर्ड मिलने का शाप दे दूं) जब एक सूट बूट धारी लड़का अचानक से आकर मेरे आगे लग गया। जब ऐसे काबिल, पढ़े लिखे लोग लाईन तोड़ बीच में ना घुसने का सिविक सेंस नहीं समझते तो आम जनता से क्या उम्मीद रखना। ख़ैर अपने साये- से साथ रखने वाले दुलारे फोन को सौंप कर मैं उस ऑफ़िस बिल्डिंग से बाहर आई। जल्दीबाज़ी या मेरी लापरवाही की सुपर पॉवर के चलते मैं याद ही नहीं कर पा रही थी कि नंबर तो 10 है लेकिन बोर्ड ए कहा या सी। फिर इसी उधेड़बुन में वहाँ मैंने झटपट दो दोस्त बनाए, उन्होंने मुझे आश्वस्त किया कि सब अंदर पता चल जाएगा और इसी बहाने मेरे पिकनिक वाले झोले में अपने हाथ में लाए लंच बॉक्सेस भी रख दिए। इस तरह हम आगे बढ़ एक बड़े हॉल या लॉबी में पहुंचे। यहाॅं कई सारे सोफ़ा लगे थे। खचाखच भरे। जगह खोजनी पड़ी (पता नहीं कब खतम होगा ये कंपटीशन)  

      हम सब कितने अलग थे। कोई डरा हुआ, कोई खुश, कोई सहमा सा बैठा था तो कोई एकदम आत्मविश्वास से लबरेज़! एक मैं थी जो पेंसिल से ले कर स्टेपलर पिन तक ले कर गई थी और एक कोई अपनी डिग्री के बिना ही चला आया था। फिर मैंने पाया कि हम सब एक-से भी तो कितने थे। ये जो हल्की सी घबराहट है, रोमांच है, भरोसा है....सबमें एक जैसा ही तो है!        

मैंने एक जगह ढूंढी और अपने कागज़ पत्तर रख कर मैं बैठ गई। फिर मुझे मिलीं एक सखी जी। उनसे मुझे कुछ उन्हें मुझसे हिम्मत मिली, कि सब अच्छा होगा। दो क्वींस की तरह हम दोनों ने एक दूसरे के पहनावे और बोलने के अंदाज़ इत्यादि की तारीफ़ की। माहौल अच्छा था। सुगबुगाहट थी...कौन सा बोर्ड किसको मिलेगा...!!         

एक रजिस्टर जो मैंने अक्टूबर में खरीदा था और  उसमें अपने नाम की जगह लिखा था "तू है कौन?"

ये आज भी मेरे साथ आया था। मैं अपने बारे में पढ़ रही थी। लग रहा था अब भी सबकुछ तो नहीं आता। कितना अजीब नहीं है...खुद को भी जानते नहीं हम। ख़ैर पढ़ते पढ़ते बार बार चैट जीपीटी की याद आ रही थी। कई बार मैंने अपना मोबाईल खोजा कि ज़रा ये गूगल करके देखूँ । बीच बीच में सखी जी और उनके बगल में बैठे गुना वाले भाई साहब से बात हो रही थी। फिर मैंने सोचा हाइड एंड सीक खा ही लेना चाहिए क्योंकि इंटरव्यू बिगड़ा तो फिर मन नहीं होगा।

     इसी बीच नाम गूंजा "लॉर्ड भाई का" मैने कहा अच्छा तो ये महाशय हैं लॉर्ड!!” गुना वाले भाई हंसकर बोले अच्छा आप भी जानती हैं मैंने बोला अखिल ब्रह्माण्ड इन्हें जानता है। लॉर्ड जी वो फैंटम हैं जो 155 का बिल ले कर सब पर फाड़ते आ रहे हैं। फिर कुछ देर में मेरा भी नाम पुकारा गया। वेरिफिकेशन के बाद जब मैं लौटी तब लॉर्ड भाई मिठाई बांट कर बधाईयाँ गा रहे थे। उन्होंने बताया के वे बोर्ड ए में 8 वें क्रम पर हैं, मैंने छूटते ही कहा "भाई प्लीज उनका दिमाग खराब करके मत आना" फिर बात सम्हाल कर कहा कि "मतलब उनकी एक्सपेक्टेशंस हाई मत कर देना " कहने लगा ...."मैडम आप बोर्ड ए में हैं ना ? ..... वो अध्यक्ष जी का है...!" मुझे लगा मेरे कानों में किसी ने मिश्री घोल दी हो। उससे कहा कि अगर मैं गई अंदर और मुझे दूसरे कोई मिले तो मैं तो मुंह ही बिचका दूंगी.... लेकिन वो बहुत ही आश्वस्त था। कारण? ये कि उसके हिसाब से चेयरमैन सर हमेशा बोर्ड ए ही लेते हैं । मैंने सोचा भोले भाले लोगों का भी बढ़िया है। कितना खुश है। इतना फालतू लॉजिक लगा कर। फिर सोचा कि इसमें नुकसान ही क्या है और मैं भी शामिल हो गई। हमने अध्यक्ष जी की अभिरुचि अनुसार बहुत से प्रश्नोत्तर तैयार कर लिए। नंबर 7 और लॉर्ड भाई का नाम अनाउंस हुआ और भृत्य अंकल दोनों को ले कर चले। मैंने कहा "ऐसे ले जा रहे हैं जैसे जिबह करने ले जाते हों" मेरे बाजू में बैठे महाशय जिनसे अब तक परिचय नहीं हुआ था बोले "क्या कहा आपने" मैंने कहा "जिबह" और वो हंसने लगे..."शानदार" ! पता चला कि वे विदिशा से थे और हाइड एंड सीक बिस्किट्स को भी ना कर सकते थे ( मतलब How on earth?) उनका हावभाव ऐसा था जैसे हम सब नन्हें बच्चे हैं उनके आगे। उन्हें कोई अता पता नहीं था कि ये बोर्ड क्या बला है और अध्यक्ष जी, आदरणीय जी और सम्माननीय जी किसके रिश्तेदार हैं! मुझसे उन्होंने सब पूछा और मुझे लगा कि यही बंदा सही है हम सब इतने दिनों से रोना पीटना कर रहे हैं और एक ये हैं अपने में खुश!!

इसी बीच किसी बोर्ड सी वाले की नज़र हमको लग गई और अध्यक्ष जी, सम्माननीय जी में बदल गए। लंच ऑर्डर करने के लिए बाहर जाने की अनुमति थी। कुछ बच्चे खाने के साथ खबर लेते आए कि बोर्ड ए, सम्माननीय जी का है और बोर्ड सी, आदरणीय जी का। फिर आया मेरा नाम... नंबर 8 वाली कन्या के संग! मैंने उससे सीढ़ी चढ़ते हुए मित्रता गांठ ली।

साक्षात्कार कक्ष के बाहर

ऊपर माहौल एकदम खतरनाक तरीके से शांत था। वहां देखा तो लॉर्ड भाई विराजमान थे। एक और भाई था नंबर 7...फिर लॉर्ड...फिर कन्या...फिर मैं !! हमारे सामने वाली बैंच पर बोर्ड सी के उम्मीदवार बैठे थे। उनकी मुस्कुराहटें दर्द भरी थीं। लॉर्ड भाई ने बताया कि आदरणीय जी बहुत देर देर तक पूछताछ कर रहे हैं बच्चों से। फिर इधर उधर की कई बातें होती रहीं। फिर वो टेलीग्राम ग्रुप के मेंबर्स के स्कोर बताने लगा... इसके उतने उसके इतने। कन्या ने कहा " मत बताओ यार" लेकिन लॉर्ड लोग सुनते कब हैं। तभी आदरणीय जी के बोर्ड से एक लड़की बाहर आई। उसके हाथ आँखों की तरफ़ जाने ही वाले थे कि उसको सबने कहा "कोई नहीं...सबका ऐसा ही जा रहा है"...इधर लॉर्ड भाई बोल पड़ा "इनके 152 हैं" और कन्या तुरंत उठकर खड़ी हो गई। मुझे लगा स्ट्रेस कम करने के लिए वॉक कर रही होगी। इतने में नंबर 7 बाहर आया और हमने उसे घेर लिया... वो थोड़ा हक्का बक्का था बोला "फैक्ट्स पूछ रहे हैं... हड़प्पा का क्षेत्रफल पूछा" और चला गया। मैं तो हताश हो गई। कन्या ने कहा कुछ नहीं जो नहीं बनता हमसे वही सर पर चढ़ जाता है। फिर हमने मेरे नोट्स में हड़प्पा सभ्यता के ऐसे ही सस्ते फैक्ट्स पढ़ डाले! तब कन्या ने मुझसे शिकायत की कि "कौन है ये यार लॉर्ड ! मैंने कब से किसी के मार्क्स नहीं पूछे लेकिन इसने ऐन मौके पर बता कर दुखी कर दिया" मैं अकिंचन उसे क्या बताती लॉर्ड भाई के बारे में। सिर्फ यही कहा कि "इसको बाहर जा कर कूट लेना कोई नहीं!"  फिर लॉर्ड भाई आया ...बेहद खुश... जाते जाते बता गया मुझे कि वो कंसेप्चुअल चर्चा कर रहे हैं। सुनकर अच्छा लगा। कन्या गई मैं बैठी अपनी "हारिए न हिम्मत" किताब पढ़ने लगी। आँखें बंद करके मैंने अपना सारा ध्यान लाड़ली जू के नाम में लगाया... कहा "मैं तो सिर्फ ये शरीर ले के अंदर जा रही हूं बाकी जो है प्राण, मन, विचार, शब्द और भाव वो आपके हैं...मेरा कुछ नहीं है!"  तभी एक सुंदरी और एक अन्य उम्मीदवार को लाया गया जिससे मेरी छोटी सी तपस्या टूटी। वो मेरे पास आकर बैठे, मैंने उससे भी दोस्ती की, हमने एक दूसरे की तारीफें करके मनोबल बढ़ाया। फिर आया मेरा नंबर!! कन्या ने भी यही बताया कि गहनचर्चा कर रहे हैं। मुझे कुछ अच्छा लगा! अगला साक्षात्कार मेरा ही था। मैंने बंद दरवाज़े के सामने खड़े-खड़े मन ही मन बुदबुदाया "मेरे भविष्य का द्वार" और मुस्कुराई! फिर यही मुस्कराहट लिए अंदर गई।

साक्षात्कार कक्ष में

बड़ा कमरा था। षड्कोणीय टेबल को तीन सदस्य सुशोभित कर रहे थे। ठीक सामने कुर्सी लगी थी। उन्होंने कहा आईए आईए.... जल्दी आईए। मैंने कहा "आप सभी को मेरा नमस्ते" अभिवादन स्वीकार कर उन्होंने मुझे बैठने के लिए कहा। कुर्सी और मेज की दूरी इतनी कम थी कि मुझे "सांस अंदर खींचासन" करके फिर बैठना पड़ा! 

फिर बोर्ड के मुख्य, सम्माननीय जी ने मुझे पूछा: "रोल नंबर बताइए"

(पैनल में तीन सदस्य थे) मैं: 16.. सम्माननीय जी : अरे 16? मैं: खी खी खी माफ कीजिएगा सर 140624 (वो हंस पड़े ) सम्माननीय जी: सोनिया जी आप अपना परिचय दीजिए पैनल को मैं: मेरा नाम....पढ़ाई का ब्यौरा दिया। फिर मैंने सर मेरी अभिरुचियों में है लेखन। मुझे लिखना अच्छा लगता है। मेरा एक ब्लॉग है "जलेबियाॅं"। सदस्य 1: जलेबियाॅं? और हँसने लगे। मैं: खी खी खी के साथ जी सर। इसके अलावा मुझे गायन पसंद है। सदस्य1: गायन किस प्रकार का। मैं: सर सुगम संगीत। प्रज्ञा गीत, जो चेतना जागरण के गीत हैं। सदस्य2: (कोष्टी जी को देखकर) "चेतना जागरण के" मैं: खी खी जी सर। (सभी मुस्कुराए, मुझे समझ नहीं आया व्यंग्य था या हर्ष) सम्माननीय जी: आप उज्जैन से हैं, संस्कृत भी पढ़ी है तो 12 ज्योतिर्लिंग के नाम बताइए मैं: (सौराष्ट्रे सोमनाथम च) धीमे धीमे गा कर, सर सोमनाथ, सौराष्ट्र में। सम्माननीय जी: अच्छा श्लोक आता है? सुनाएँगी। सुनाइए! मैं: ( मैंने द्वादश ज्योतिर्लिंग स्तोत्रम् गाया। यही था जो सुबह गाया नहीं था। मैंने तो इसे बाबा की इच्छा माना) सम्माननीय जी:  अच्छा हो गया पूरा, आ गए सारे नाम मैं: जी सर सम्माननीय जी: अच्छा सोनिया आप देवी अहिल्या विश्वविद्यालय से पढ़ी हैं, खरगोन से हैं, तो देवी अहिल्या के बारे में पढ़ा होगा मैं: खीखियाते हुए हां सर!! ( मेरी तो मानो लॉटरी लग गई। मातोश्री पर तो मैं महीने भर में एक समझो पीएचडी ही कर ली थी) सम्माननीय जी: इस वर्ष हम क्या कुछ विशेष हो रहा है उनसे संबंधित? मैं: जी सर मातोश्री की 300वीं जन्म शती मनाई जा रही है। सम्माननीय जी: हाँ और इसी के उपलक्ष्य में कई सारे आयोजन किए जा रहे हैं। आप बताईए कि उन्हे देवी, पुण्य श्लोका और राष्ट्र सेविका क्यों कहा जाता है। मैं: सर देवी तो उन्हें उनके व्यक्तित्व और कृतित्व के लिए कहा जाता है। मैं एक उदाहरण दूं, कोष्टी जी: हां हां दीजिए मैं: हमारे खरगोन के जिला अस्पताल के आगे अहिल्या माता का एक स्मारक है। वहां मैंने कितनी ही बार रोगी के परिजनों को हाथ जोड़े खड़े पाया है। (सभी मेरे उत्तर से पर्याप्त संतुष्ट लगे) सम्माननीय जी: अच्छा फिर ये पुण्यश्लोका मैं: सर पुण्यश्लोक उन्हें कहते हैं जिनके स्मरण मात्र से पुण्यों की प्राप्ति हो जाए। ऐसे केवल 4 व्यक्ति हैं, श्री कृष्ण, राजा जनक,सम्राट युधिष्ठिर और राजा नल!! और आपने पूछा था राष्ट्रसेविका, तो वो इस अर्थ में कि सबसे पहले उन्होंने एक लोक कल्याणकारी राज्य स्थापित किया। दूसरे उन्होंने मंदिरों के महत्व को समझा कि यदि मंदिर हैं तो शिक्षा है मंदिर हैं तो जन कल्याण है और इसी लिए कई मंदिर बनाए।( इसी में मोदी जी ने जो काशी विश्वनाथ के टाइम उनकी मूर्ति लगाई वो भी बता दिया)। इसके अलावा उन्होंने एक ऐसा सशक्त राज्य बनाया जो 1818 तक कायम रहा और अंत तक लड़ता रहा रहा पूरे मराठा साम्राज्य में। मातोश्री स्वयं महिला सशक्तिकरण के लिए मिसाल रहीं और इस दिशा  में कई प्रयास भी किए। ( माननीय सदस्य 1 कुछ सख्त थे कभी कभी ही मुस्कुराते थे लेकिन सदस्य 2 हँसमुख थे) सम्माननीय जी: अच्छा सर आप पूछिए अब सदस्य2: सोनिया जी आपने MA में कौन कौन से विषय पढ़े थे। मैं: बचते बचाते बता दिए सदस्य2: अच्छा सोनिया ये जो भारत का नाम है ये कहीं आता है क्या मैं: जी सर विष्णु पुराण में सदस्य2: क्या कैसे मैं: उत्तरस्य .. (मैं थोड़ा ठिठकी तो दोनों माननीय सदस्यों ने ही पूरी कर दी पहली पंक्ति) मैं: सर मैं अर्थ बता देती हूं कि हिमालय के दक्षिण में, समुद्र के उत्तर में फैला भू भाग भारत और इसके निवासी भारतीय कहे जाते हैं। (यहीं किसी ने पूछा किस समुद्र के उत्तर में) मैं: हिंद महासागर (ठीक ठीक) सदस्य 2: अच्छा गांधार और मथुरा कला में अंतर बताइए! मैं: बता दिए (मैं इतने लंबे उत्तर दे रही थी लेकिन उन्होंने मुझे रोका नहीं, मुझे ही स्वयं को रोकना पड़ा कि इतना बहुत है अब चुप हो जा बहन) सदस्य2: ठीक ठीक। विश्व इतिहास में धर्म सुधार के नेता कौन थे? मैं: सर मार्टिन लूथर। उस समय धर्मतंत्र द्वारा जो जन सामान्य का आर्थिक शोषण किया जा रहा था उसी का उनने विरोध किया। (इसी तरह का अमूर्त उत्तर कुछ चतुराई से ताकि वो कोई फैक्ट ना पूछ बैठें) सदस्य2: (सहमत होते हुए) ठीक है। (सदस्य1 जो बहुत देर से बात पकड़े बैठे थे ) सदस्य1: सोनिया आपने कहा कि महिला सशक्तिकरण किया अहिल्या बाई ने तो आपके हिसाब से महिलाओं को ज़रूरत थी क्या शक्ति की। हम डरा धमका कर रखते थे ? कहीं आप वेस्ट के नेरेटिव से प्रभावित तो नहीं हैं?? (मेरी तो मुस्कुराहट कानों के कोनों को छू गई। मैंने सोचा इन्होंने तो मेरे दिल की बात बोल दी। मैं खुद भी यही सोचती हूं लेकिन यहां ध्यान से जवाब देना होगा क्या पता मुझे ट्रैप कर लें)

मैं: सर सशक्तिकरण से मेरा मतलब था कि किसी को निर्णयों और अवसरों को भुनाने में सक्षम बनाना.... सदस्य1: हां मतलब शक्ति तो नहीं थी ना नारियों में मैं:सर मैं जानती हूं कि भारत ही एकमात्र ऐसी सभ्यता है जहां वैदिक काल में ऋषिकायें हुईं और हम प्रगतिशील ही थे लेकिन मैंने देवी अहिल्या की बात की जिनका काल मध्यकाल था। तब तक इस प्रकार की कुछ.... ( सदस्य2 इतने खुशी से देख रहे थे जैसे मैं उनकी रिश्तेदार हूं। हामी भरने लगे मेरी बात पर लेकिन मेंबर 1 बीच में ही बोलने लगे) सदस्य1 : अच्छा मतलब मध्यकाल में सब खराब थे। तो रानी रूद्रम्मा, देवी अहिल्या (और कई ऐतिहासिक नारियां) ये सब क्या शक्ति हीन थे। मैं: सर मैं वहीं आ रही थी कि हमारी संस्कृति सामासिक है, जब आक्रांता आए तो उनकी सोच थी कि महिलायें संपत्ति हैं। उन्होंने हमें उसी तरह से अटैक किया और इसी के चलते हमें अपनी स्त्रियों की सुरक्षा के लिए कुछ उपाय करने पड़े जो बाद में थोड़ी विकृतियों का कारण बने.... (सम्माननीय जी जो अब तक मेरे 70 पेज के दस्तावेजों में मगन थे, सर उठा कर चश्मा रख कर बैठ गए और मुझे देख कर सुनने लगे) सदस्य1: अच्छा विकृत हो गया हमारा समाज मतलब क्या? चलो मैं ही बोल देता हूं पर्दा,सती,जौहर.... जौहर पर आपका क्या विचार है? मैं: सर मेरे लिए यह एक इतनी ऊंची बात है जिसको मैं दुनियावी चीजों से माप ही नहीं सकती। मेरे हिसाब से इसको उसूलों और अध्यात्म की दृष्टि से देखा जाना चाहिए! सदस्य1: आप बस इतना बताईए कि आप जौहर से एग्री करती हैं या disagreee मैं: (कुछ रुक कर मैंने सोचा कि तर्क तो दे ही चुकी हूं ) सर agree करती हूं!! सदस्य1: बस यही सुनना चाहता था मैं! और सती? मैं: सर मुझे लगता है इस पर अभी और शोध करना चाहिए। Dr मीनाक्षी जैन जी की हाल ही में एक पुस्तक आई है इस बारे में सदस्य2: (खुश हो कर) अच्छा आपने पढ़ी है मैं: सर अभी अभी ही आई है मैंने उन्हें सुना है इस बारे में समझाते हुए! सदस्य2: अच्छा अच्छा बताईए सदस्य1: नहीं हमको तो सोनिया जी के ही विचार जानने हैं! मैं: जी सर मैं कहूंगी कि मुझे कुछ सदस्य2: (मेरी सहायता करते हुए) आप तो सर को बस ये बता दो कि वो कह रहे हैं सती होने की प्रथा थी... थी क्या?? मैं: जी सर अब मैं समझ गई । यदि आप इसे" प्रथा" कह रहे हैं तो वो त्रुटिपूर्ण होगा। परंपरा में अनिवार्यता होती है यहां वो नहीं थी! सदस्य2: (मुस्कुराते हुए) बस सोनिया जी यही बोलना था!! मैं: जी सर मुझे लगता है मेरा शुरू में महिला सशक्तिकरण वाले वक्तव्य का मंतव्य कुछ अलग अर्थ ले गया!! ( सभी हल्का सा मुस्कुराए) सदस्य1: आपका पसंदीदा हिस्सा कौनसा है इतिहास में मैं: सर मुझे प्राचीन भारत और उसमें भी शुंग काल अच्छा लगता है। मैंने उस पर पढ़ने का प्रयास किया है। सदस्य1: क्यों? मैं: पहला तो यही कि मैंने संस्कृत साहित्य पढ़ा है उसमें महाकवि कालिदास जी का "मालविका अग्निमित्रम" पढ़ा था। उसमें इतिहास पढ़ा तो आकर्षक लगा। दूसरा मैंने देखा है कि शुंगों पर रोज नए आक्षेप सुनने मिलते हैं जो अतार्किक लगते हैं। सदस्य1: क्या आक्षेप?? देखो आप तो खुल कर बोलो यहां। मैं: सर एक सुना था कि पुष्यमित्र ही राम हैं.... सदस्य2 : अच्छा पुष्यमित्र ने अश्वमेध भी किए थे वो किस अभिलेख से पता चलता है?? मैं: सर धनदेव का अयोध्या लेख सदस्य2 : ठीक ठीक सदस्य1: सोनिया आप तो साफ साफ बोलो कि पुष्यमित्र ने एक कमज़ोर शासक को हटा कर सशक्त साम्राज्य की स्थापना की थी इसीलिए आपको पसंद है! मैं: सर वो तो है ही! तीसरा कारण यही था!! ( फिर तीनों ने एक दूसरे को देखा मैंने तीनों को देखा) सम्माननीय जी: सोनिया आपका साक्षात्कार हो गया मैं: ( बेवकूफों जैसे) हो गया सर? तीनों ने हंस कर कहा "हां हां हो गया आप जा सकती हैं !!" मैं: धन्यवाद सर! आप सभी का दिन शुभ हो तीनों: आपका भी सोनिया जी!!

नवंबर 27, 2024

जो घटी नहीं!

प्रश्न:  "क्या कोई ऐसी याद हो सकती है जो अब तक घटी न हो ...?"
उत्तर: "उसे याद नहीं 'चाह' कहते हैं।"
ठीक। फिर कुछ 'यादनुमा चाहतें' जो घटी नहीं पर घटी-सी लगती हैं।
    अलसाई दोपहर। जून का तपिश हटाता नम महीना। बाहर हल्के बादल। दूर कहीं बारिश जिसकी ख़बर मुझे मिट्टी की सौंधी महक ने आ कर दे रखी है। मैं बड़ी-सी खिड़की के पास बैठी कहानी की किताब में गुम हूँ। घर में कुछ लोग हैं पर सब सो रहे हैं। अचानक बूंदा बांदी की शुरुआत... मेरी किताब के पत्ते पर एक बूंद गिरती और तुरंत सोख ली जाती है.... मैं गाती हूं.... 'बदरा....' । ऊपर गड़‌गड़ाहट जारी है। लगता है जैसे कुछ बेहद अच्छा होने वाला है। थोड़ी खड़‌खड़ाहट शुरु हो गई घर में है। कोई तो जागा है। मुझे अच्छा लगता है। मैं एकान्त प्रिय नहीं हूं। कोई मिलेगा बतियाने को। चाय में उबलती अदरख पूरा माहौल बना रही है। मुझे थोड़ी ठण्ड महसूस होती है। बीती सर्दी में, गर्मी की आहट आते ही दफ़न कर दिए गए बिस्तरों में से एक हल्का कम्बल ले आती हूँ। चाय तैयार है। कप में छनने की आवाज़ जैसे छतों में भरा पानी निकास पाईप से नीचे गढ्‌ढा करता गिर रहा हो। एक एक करके सभी जाग चुके हैं।
हर कोई इस बड़ी खिड़की से आते मौसम में डूबना चाहता है। सामूहिकता में सुकून है। बारिश अब ज़ोर पकड़ने लगी है। । चाय आ चुकी है। चुस्कियों में सब मौसम पीते हैं। बाहर अब देखने जैसा कुछ खास नहीं है। पक्षी भीगे भीगे से एक कतार में तारों, छज्जों पर बैठे हैं। एक ठहराव है। बारिश के पानी में घुल घुल बहती मिट्टी में भी । चाय के प्याले ले जाए जा चुके हैं। बात, शाम के खाने में क्या बने के राष्ट्रीय यक्ष-प्रश्न पर चल रही है। किताब मोड़ कर बगल में रख दी गई है। अचानक कोई कुछ गुनगुना उठता है.... अब बातचीत का रुख सुरीला है। कोई नहीं चाहता कि ये सिलसिला खत्म हो....। बैठकी का आनन्द । सबको पता है  उठना पड़ेगा। फ्रिज में पड़े बासी आम न खाने की शिकायत नेपथ्य से आती है। अब आम नहीं, गरम भुनी मूंगफली खानी है सबको।

घ्राण संवेदनहीनता


पिछले पन्ने पर "खुशबूदार यादें" सहेजने को तैयार मैंने सोचा था क्या कि अगले पन्ने पर ये लिखना पड़ेगा ?
 आज पूरे तीस दिन हो चले हैं... मेरी "घ्राण शक्ति" के चले जाने के । कारण... वही .. प्रारब्धों का हिसाब करने आया कोरोना वायरस ।' सूंघ न पाना' भी एक विकलांगता है।
        बारिश आई... मिट्टी की सौंधी गंध न हासिल हुई। चम्पा के, बड़े दिल से लगाए पेड़ पर फूल आए पर खुशबू न आई। अब तक पर आम की वो मोहक महक नहीं मिली जिससे गरमी के  मौसम का अहसास मुकम्मल हुआ करता था। किसी मन्दिर में होने का अहसास कराने वाले 'तुलसी' और 'दौणा', बिना खुशबू के बस 'हरे पत्ते' बन कर रह गए हैं। एक प्याली चाय में आधा किलो अदरख डाल दें तो भी वो ताज़गी नदारद रहती है । मतलब अदरख का स्वाद बिना उसकी तीखी गंध के बन्दर तो क्या इंसान को
भी नहीं आता ।
         सबसे ज़्यादा तो दुःख इस बात का है कि अब मैं उस " सांकरी खोर"  तक जा कर भी वो दूध-दही की खुशबू नहीं ले पाऊंगी जहाँ श्री कृष्ण ने चंद्रावली की मटकी फोड़ी । "सांकरी खोर" अपने आप में इस बात की पुष्टि करती है कि "खुशबुएं", यादों के कैप्सूल्स हैं,  हज़ारों साल पहले यादों के घटे लीलाक्रम को एक बार फिर से अनुभूत करवा देने वाले। 
       जाने कब खत्म होगी ये "घ्राण संवेदनहीनता"....!! 

खुशबूदार यादें

      काश! ऐसा हो... कि जब अभी मैं यहाँ बैठी अपनी मन की मुराद डायरी के पन्ने के हवाले करने में लगी हूँ, कहीं कोई ज़हनी जादूगर ऐशी मशीन बनाने में लगा हो जिसमें हम अपनी "खुशबूदार यादें " सहेज सकें ।

. ऐसी खुशबू जिनको मन किसी सुंदर याद से नत्थी कर लेता है। मेरे पास तो एक बड़ा पिटारा है। ऐसे कोई खास खुशबू आई... और कोई खास-ही याद भी नुमायाँ हो गई। 
      अभी-अभी फिआमा डिविल्स बॉडीवॉश की खुशबू आते ही बरसों पुरानी कई यादों ने मन में परेड की एक बाद एक....
       यूनिवर्सिटी, पहला सेमेस्टर, जन्मशताब्दी महोत्सव, बर्फीली ठण्ड, कुछ गाने- "कोई दिल बेकाबू कर गया", महा मज़ेदार गाना "ऐ दिल ! दिल की दुनिया में"... मेरी दोस्त अन्नूरानी ❤️!! 
 वक्त में पीछे जाना तो बूते की बात नहीं लेकिन ये खुशबुएं जैसे कोई यान हैं जो मुझे वहां ले जाया करती हैं!!  

          एक दोपहर 

जब भी 'आलू का हलुआ' खाती हूँ, स्वाद से पहले याद आ जाती है बेहद आम-सी एक खास याद ! तो Inside Out फिल्म में होती हैं न - सुनहरी यादें.. उन्हीं की तरह ।  
जब पहली बार मैंने आलू का हलवा खाया था... महीने का आखिरी दिन था। मेरी स्कूल से जल्दी छुट्टी हो गई, थी और घर में एक नई-सी खुशबू घुली हुई थी इसके बाद जो याद है वो यही कि मम्मी किचन और आंगन के बीच के दरवाजे पर चटाई बिछाकर कोई उपन्यास पढ़ रही हैं... मैं  बैठी हलुए का लुत्फ उठा रही हूँ... बेहद अच्छी हवा चल रही है... कुछ और किताबें वहीं बिखरी हैं... मैं  रंग-बिरंगी आयताकार किताब 'घड़ियों की कहानी' पढ़ रही हूँ। दिल खुश है... जैसा किसी भी बच्चे का होना चाहिए.... वैसा अच्छा न जाने कब लगेगा !! 
                              मम्मी का पल्लू थामे, 
                              सारा दिन निकल जाता था । 
           वो बेवजह-सी खुशी बेहिसाब, 
           मन कहाँ से पाता था?

नवंबर 26, 2024

लला का दिन


 पौ फटते ही

भारत के' प्राण' की प्रतिष्ठा' दैनिक भास्कर की आज की हेडलाईन । सब सवेरे से तो रोज ही उठ जाते हैं पर आज जैसे "जागे"। पापा बारम्बार पूछ रहे थे- "कब है प्राण प्रतिष्ठा" मम्मी का उत्तर आता था - "12 बज कर उनतीस मिनट से बारह तीस के बीच के 84 सेकण्ड्स... बस" हर बार यही, शब्दशः यही उत्तर!
     मैं तो उठकर नहा-वहा कर कुछ इस "दिन" के उपलक्ष्य में लिखने बैठ गई, मम्मी रोज के कामों में पार्विक उत्साह से जुट गईं। उनका तो निर्जल व्रत भी था। पापा छत पर लाईटिंग (सीरिज इत्यादि) लगाने की मशक्कत करने लगे।
  प्रातः 9:30 

पापा ढेर सारे फूल और साथ एक भगवा कुर्ता और केसरिया रंगी रेशमी झण्डा भी ले आए। कॉलोनी तो बीते दो-तीन पहले ही सज चुकी थी। अब पापा का मन था कि द्वार पर फूलों की वन्दनवार लगाई जाए । अगला 1:30 घण्टा मैंने और उन्होंने फूल की माला से वन्दनवार बनाने में बिताया।
मैंने सोच रखा था कि प्राण प्रतिष्ठा वाले दिन एक खिलौना गुड़िया से छोटे से राम लला बनाऊंगी। मैं सुबह से ही अपनी गुड़िया को नीला रंग पोत कर धूप में छोड़ आई थी । ( 'राम' जैसे दिखने भर के लिए भी धूप में तपना तो पड़ेगा) 
  लगभग 11:30 बजे 

इधर हम भाग-भाग कर नीचे द्वार पर तोरण लगाने में जुटे रहे उधर मोदी जी मंदिर पहुंच गए। तोरण लगाने में समय लगने से हमें अलग तनाव था जैसे राम जी आएंगे तो कहेंगे कि "बड़ी ख़राब वेवस्था है यार! तुम्हारी वन्दनवार अब तक नहीं लगी जबकि गा तो पिछले दो महीनों से रहे हो 'राम, आएंगे तो अंगना सजाऊँगी'...?"
अंततः हमने यथाशीघ्र उसको द्वार पर सजाया और सरपट दौड़े टी.वी. के पास । मोदी जी भीतर प्रविष्ट हो रहे थे चांदी का मुकुट और पोशाक लिए। पण्डितगण से ज़्यादा हम सब अधीर हो रहे थे कि कहीं अभिजीत मुहूर्त निकल न जाए ।

 साढ़े पांच सौ वर्षों बाद आया अविस्मरणीय क्षण

     शुरु में तो मेरा ध्यान सब ओर था कि क्या नक्काशी है... कैसा परदा है.... छोटे से राम लला विराजमानः फूलों के बीचे लुके- छिपे से साइड फेस से दिख रहे थे । फिर आया जीवन का सबसे अविस्मरणीय समय :
"एकाएक कैमरा रामलला विग्रह को दिखाने लगा...हृदय रुकने की संभावना की चेतावनी दिए बिना! एक पल पहले मन में इतनी उथल-पुथल थी जैसे उन्हें देखते ही शान्त हो गई। अश्रु, जो मेरी पलकों पर ही रहते हैं ऐसे बहने लगे जैसे कोई स्पंज को दबाए और उससे पानी बहे। अश्रु-धारा नहीं थी...प्लावन कहते हैं इसे । मन में कुछ नहीं था बस इसके सिवा कि कैसे इन्हें पाया जा सकता है। जैसे कोई सुन्दर वस्तु देखकर पाने को, स्वादिष्ट देख के खाने को मन ललचाता है.... वैसे । ऐसे टीस सी उठ रही थी कि मैं इतनी दूर क्यों हूं फिर अगले ही पल ये लगता था कि यहीं तो हैं। हैं... नहीं है.... मिल गए... चाहिए... सब जैसी भावनाएँ एक साथ । मुझे फ़फ़क फफक कर रोना आ रहा था। इतने सुन्दर... मनमोहक... आकर्षक.. इतनी स्मित मुस्कान.... इतना ऐश्वर्य उसके बाद भी जैसे अपनी विनयशीलता से सबको देखते हुए... प्रेम-वर्षा करते हों। मुझे इतनी स्नेहासिक्त अनुभूति हो रही थी कि जैसे 'मैं' चला गया था बस 'वे' थे। 
      जब भी SCREEN पर रामलला को छोड़कर लोगों या हेलिकॉप्टर या यजमानों को दिखाते मुझे अजीब-सी पीड़ा होती (सामान्यतः क्रोध आता है) जितना देखें राघौ जी को मन ही नहीं भर रहा था। जब एक स्वामी जी ने नैवेद्य-अर्पण के समय चेहरे पर कपड़ा डाला तो ऐसे लगा जैसे लला उन्हें देखकर वही त्रिलोक-जित मुस्कान बिखेर कर देख रहे हैं ...
   शुरु की स्ट्रीमिंग में विग्रह साइड फेस से दिख रहा था। फिर जब रामलला का सुन्दर चेहरा सामने से दिखाया ... इतने आँसू भर गए कि दिखा ही नहीं.... झटपट पोंछ-पोंछ के देख रही थीं जैसे कुछ बेहद स्वादिष्ट मिला हो खाने को जो फिर कभी न मिलने वाला हो .... भकोस-भकोस कर देखने का मन हो रहा था। राघौ जी के चरण .. अहा... वे भी इतने सुन्दर थे कि बस देखते रहा जाए। धनुष जिस तरह चरणों के पास टिका दिखता था... श्री राम के शौर्य... बल... शक्ति उनके सर्वशक्तिमान होने और अपने, उनके संरक्षित-आश्रित बच्चे होने के गर्व और कृतज्ञता से ओत-प्रोत कर रहा था |
इतने रुप... इतने भाव ! कभी लगता था कि बाल-रूप में हैं कभी सर्वेश्वर- सर्वशक्तिमान दुनिया के राजा राम कभी किशोर-गंभीर-स्नेही भाई ! एक पल शक्तिशाली श्रीराम से शरणागति का, तो भाई राघव जी से स्नेहिल अंकमाल पाने का मन करता था। सबसे सुन्दर तो बालरूप लला से प्रेम (जैसे किसी भी बच्चे की मैं गोदी में सिर रखा उससे सिर पर फिरवाना.. उसका, हमें बड़ों की तरह पुचकारना अच्छा लगता है ना ) पाने को मन मचलने लगता था। 
एक साथ एक समय पर इतनी दिव्यता - भव्यता और सारल्य भी।
हम सभी पिछले कई दिनों से रोज़ "राम आएंगे " गाते - सुनते - गुनगुनाते रहे । जाने - अनजाने - किसी भी भाव से हमने उन्हें बुलाया ना... और सुना है भगवान सुनते हैं इसीलिए वे आ गए। इसीलिए ये विग्रह इतना जीवन्त लगता है। इसीलिए मेरे अश्रु बह रहे हैं। इसीलिए हम सब इतने भाव-विभोर हैं।
       रामलला स्वागत है।
आपका नाम मन में सदा के लिए प्रतिष्ठित रहे...
             फिर आरती के बाद गर्भगृह से कैमरा बाहर निकल गया और ये सब पवित्र-आत्मीय भाव मेरे दिमाग़ से । कैमरा बाहरी मंच पर जा पहुंचा और इधर मन में उत्साह ने प्रवेश किया। ऐसा आनन्द आ रहा था जैसे अब कभी ख़त्म ही नहीं होगा।
   मैं अपनी गुड़िया और सारे उपकरणादि पहले ही ले कर बैठी थी पर राघव जी ने ऐसे मन को बांधा कि उन्हें ही देखते रह गई। अब स्वामी जी इत्यादि के भाषण सुनते हुए मैं अपनी सजाने लगी मुझे थोड़ा हीन लग रहा था कि राम लला तो कितने भव्य-दिव्य हैं क्या में इस गुड़िया को उस‌की परछाई का अंश भी बना सकूँगी, पर इससे बेहतर और क्या था कि बार-बार इसी बहाने श्रीराम के स्वरूप का ध्यान होगा...?

     शाम होने तक यही चला फिर दीवाली वाली धूम मच गई। मम्मी का आदेश हुआ कि रंगोली भी बनाई जाए। मैं और पापा दीदी की अनुपस्थिति का लाभ उठाकर एक औसत डिज़ाइन की रंगोली चुनकर अनुपालन में जुट गए। हमने तीन शिखर; नीचे धनुष व 'जय श्री राम' लिखी रंगोली बनाई। फिर दिये लगाए गए, वस्त्र बदल कर 'राम जन्म स्तुति' व 'श्रीराम स्तुति' का सस्वर पाठ करके आरती की गई। पिछले कुछ समय से नियमित रूप से निकलने वाली मोहल्ले की सांध्य फेरी में आज मैं भी गई। रास्ते में एक घर के बाहर एक 4-5 वर्षीय (अपने रामलला की वय का) बालक हाथ में भगवा ध्वज लिए लहरा रहा था और बेहद प्रेम से 'जय श्री राम' से सबका अभिवादन कर रहा था। पता नहीं क्यों से देख मन द्रवित हो उठा। उस थोपी हुई ग्लानि से ये बालक बच गया जिसने मेरे जैसे कितने लोगों को अपनी आस्था को अपराध की तरह छिपाने को विवश कर रखा था...!! 
               सियावर रामचन्द्र की जय!

सितंबर 28, 2024

दुपहरी में खुराफ़ाती बच्ची

 नानी के घर की बात है जहां उस वक्त नाना नानी नहीं थे। दीदी हॉल में टीवी देख रही थी। मुझसे बोली -"तू अंदर जा अब "वो" आएगा।" (एक आदर्श अग्रजा के जैसे चिढ़ाने वाली तू बेवकूफ है वाली नज़रों से देखते हुए)
मैं - "कौन?"
दीदी - "वो... और नहीं गई तो फिर बाद में जाने नहीं दूंगी।" (मेरी गर्दन में अपनी बांह लपेटते हुए)
मैं -"हम नहीं जाएंगे जी!" ( एक आदर्श अनुजा की तरह आपका राज है क्या वाले ढीठपन से)
फिर टीवी पर डरावने जोकर वाला हॉरर शो "वो" शुरू हुआ।

दीदी ने अब और कसकर पकड़ लिया...बोली-
"अब देख... पूरा देख...!"
   मैंने रोए रोए ब्रह्मास्त्र फेंका- "मम्म्मी दीदी भूत दिखा रही हैं" दीदी ने एक विजेता जैसे मुझे धकिया के छोड़ दिया।
                फिर वहां से मैं चली एक नया कारनामा करने। मामा हॉल में सोए थे। मम्मी और उनकी बुआ अंदर वाले कमरे में थे। पांच छः साल की मुझ खुराफ़ाती बच्ची से बेखबर उन सबकी दुपहरी में भगदड़ मचने वाली थी।
  कुछ देर बाद मेरे रोने की आवाज़ से सब घबराए हुए दौड़े आए ।
 "मैंने कान में मोती डाल लिया" चिल्ला चिल्ला कर मैं रो रही थी। किसी ने 'कौन से मोती... कहां से मिले तुझे!?' जैसे गैर-ज़रूरी सवाल दागे। हर खतरनाक चीज़ बच्चों के हत्थे चढ़ ही जाती है या ये कहें कि हर चीज़ को वो खतरनाक बना लेते हैं)
   तत्काल मम्मी के दो चांटे प्राप्त हुए। ( मां के लिए 101 नुस्खे नामक किताब में पहला नियम यही है कि कोई भी बात हो सर्वप्रथम संतान को थपेड़ देवें) बुआनानी ने उनसे मुझे बचाया कि तब तक मामा भी उठ कर आ गए।
  मामा किसी सर्जन की तरह हाथ आगे किए बोले - "दीदी कैंची लाओ" फिर सधे हाथ से कैंची कान में डालकर मोती खींच लाए। समझाने लगे कि ऐसे कान में कुछ नहीं डालना चाहिए वर्ना कान काटना पड़ता है इत्यादि....! जबकि मम्मी के मुताबिक खुद इन मामा ने छुटपन में कान में गेहूं डाल लिए थे और डॉ को दिखाने पर पता लगा था कि उस कान में तो पहले से ही स्लेट-पेंसिल मौजूद है। खैर मैंने राहत की सांस लेते ही मामा से कहा -"दो मोती आपके भी कान में डाले थे।"

मासूम डर !

मैं मम्मी के साथ किसी के घर गई थी।
मेजबान -" गुड़िया चाय पीती है ना!"
(लगभग एक साथ) 
मैं- 'हाँ'
मम्मी-'नहीं ये चाय नहीं पीती'  
(कमरे में जानलेवा खामोशी)
मेजबान ने तुरंत अगली गेंद डाली -'बेटा कचौड़ी पसंद है आपको।' 
मैं - ' समोसे ज़्यादा पसंद हैं वैसे।' 
मम्मी ने आग्नेय आंखों से देख कान में कहा -'तू घर चल!' 
डर मेरी रूह में दौड़ गया। 
चाय आई... नाश्ता भी.. आंटी का मनुहार भी पर मुझसे कुछ खाया नहीं गया। चाय गटक ली। 
चाय के लिए "हां" करने के बाद से ले कर घर लौटने तक मम्मी के आगे एक भी गलती नहीं की। 
ना रास्ते में पड़े प्लास्टिक कप को लात मारके घर तक लाया गया। ना ही कुत्ते के बच्चे से खेला गया। मम्मी के घर के बाहर ही पड़ोसी आंटी से बात करने रुक जाने पर भी खुद दोस्तों संग खेलने भाग जाने का मौका भी कैश नहीं किया गया।घर आते ही चप्पल दो दिशा में नहीं फेंके गए।आते ही टीवी चालू करने का पाप तो दूर, उल्टा चुपचाप होमवर्क करने जैसी महानता का प्रदर्शन किया गया। घर की बेजान चीज़ें भी भौंचक्की थीं कि पचास रुपया काटो ओवरएक्टिंग का
          शाम जैसे तैसे कटी। रात के साथ पापा भी आए। बेल बजते ही किताब फेंक कर  दरवाज़ा खोलने भी नहीं दौड़ी।
मम्मी, जो अब तक अनदेखा कर रही थीं, ने हंसी को दबाए रखकर मुझे कड़ी आवाज़ में किचन में बुलाया। मम्मी लोग बड़ी गुणी होती हैं। ऐसी टोन में आपका नाम लेंगी कि आप समझ जाएंगे कि प्रसाद हाथ में मिलेगा कि गाल पर।     
      मार का डर नहीं था। अक्सर होता भी नहीं। डर होता है माँ के प्यार से हाथ धो बैठने का। माँ की रुखाई उनके चांटे से ज़्यादा दर्द देती है। मम्मी ये सोच ले कि मैं एक अच्छा बच्चा नहीं हूं और प्यार करना बन्द कर दे तो?
     ये सोचते हुए जब मैं किचन में पहुंची तो पाया कि मम्मी प्लेट में पापा के लाए समोसे निकाल रही थीं। मुझे टेढ़ी नज़र से देख बोलीं - ' इसके साथ चाय भी पियोगी?' 
मैं चुप! 
'ऐसे किसी के घर जाते हैं तो चटोरे नहीं बनते अच्छे बच्चे!' 
हँसकर कहा और थोड़ा दुलार दिया।
      ये हँसी, प्यार और समोसे की प्लेट ले कर मैं भागी,टीवी चलाया, रिमोट पर तेल सने हाथ लगाए, सोफा पर पानी छलकाया, तीखा खाने से निकले नाक आंख के पानी को आस्तीन से पोंछा, फिर समोसे के पेट से मसाला  निकाल पापा की प्लेट में पहाड़ बना दिया, मैदे का छिलका भकोसा, खाली प्लेट और अपने पैर टेबल पर रखे और नाक में उंगली डाल मोती बना बना कर सोफे के हत्थे पर रखने जा ही रही थी कि मम्मी ने आकर एक चपत लगाई।
   इस बार डर नहीं लगा। मम्मी की गोद में ही सिर रख थोड़ा सुबकी और सो गई। 

नवंबर 10, 2017

इतिहास “देखना”...


 ...कुछ डरों की बरामदगी...वाया मोहेंजो दारो”!!


मोहेंजो दारोदेखी......(मेरे ख्याल से ये बताना या ऐसी कोई भूमिका रखना कि मोहेंजो दारो एक फिल्म है बड़ा ही आउट-डेटेड काम होगा. आजकल सबको सबकुछ पता होता है. अब वो वक्त नही रहा जब मेरे कहने पर कि मैंने कल हैरी पॉटर देखी..मेरी सहेलियाँ मुझे ऐसे देखें जैसे मैंने पश्तो में कुछ कह दिया हो....क्योंकि मुझे यकीन है कि आज वो सहेलियाँ भी “F.R.I.E.N.D.S.” या “Game of Thrones” से नीचे तो बात भी नहीं करती होंगीं) ....और जब से देखी है मन में आईं बातें; शब्दों में बदलने को कुलबुलाये जा रही हैं. फ़िल्में मैं खूब देखती हूँ लेकिन सब पर लिखने की तबियत नहीं होती. ये तो इतिहास की ओर रुझान है जो मुझसे कुछ लिखवा पा रहा है.
डर...इतिहास के गुम हो जाने का..!
अक्सर मुझे ऐतिहासिक पृष्ठभूमि पर बनी फिल्में,सीरियल आदि देखने में उकताहट होती है.कारण वही कि इतिहास में अब तक जो पढ़ा है उससे इन तमाशों का साम्य बिठा पाना जरा मुश्किल लगता है. आज आप चार लोगों के बीच कहिये कि जोधा, अकबर की नहीं बल्कि जहाँगीर की रानी थी, तुरंत आपकी डिग्री फर्ज़ी करार दे दी जाएगी...भई! क्यों नहीं...सबने जोधा-अकबर फ़िल्म जो देखी है...टीवी सीरियल की तो पूछिये ही नहीं. 'माहम अनगा '  को तो इतिहासकारों से ज्यादा आजकल आंटी-लोग जानती हैं...!!
        अपने फायदे के लिए फिल्मी लोग इतिहास को खूब भुनाते हैं.... हाल ही में पद्मावतीफिल्म पर गज़ब का विवाद उठा. अगर मैं कह दूँ अलाउद्दीन खिलजी का पद्मावती कनेक्शन इतिहास में कहीं नहीं मिलता. यकीनन खिलजी ने चित्तौड़ पर हमला किया था पर ये जो पद्मावती वाली कहानी है दरअसल खिलजी के जाने के तकरीबन सौ साल बाद जायसी ने पद्मावतनाम से लिखी थी जो विशुद्ध साहित्यिक रचना हैऐतिहासिक नहीं...तो लोग झट से बोर हो जाएंगे...(आप भी हो गये ..?) 
           अब अगर ऐसे दर्शकों के लिए भंसाली साहब खिलजी के चित्तौड़ पर हमला करने के असली कारणों पर फिल्म बनाएँ तो उसका फ्लॉप होना तो तय ही है. चूँकि कोई भी फ़िल्मकार खुद इतिहास नहीं बनना चाहता इसलिए बेचारे इतिहास को ही कोम्प्रोमाईज़ करवा दिया जाता है.

डर...कल्पनाओं की कमाई लुटने का !!
जब हम कुछ पढ़ते या सुनते हैं तो मन में उसकी कल्पना भी करते जाते हैं.किरदारों को शक्लें देते हैं.मन ही मन नई दुनिया बसाते हैं...पर ये हिस्टोरिकल ड्रामे सब कचरा कर देते हैं जैसे महाभारत-रामायण सीरियलों को ही ले लीजिये. राम कहने भर से अधिकतर लोगों के मन में अरुण गोविल का चेहरा घूम जाता है....कृष्ण के लिए नीतीश भारद्वाज....तो भीष्म पितामह के लिए मुकेश खन्ना का... ( जो लोग महाभारत-रामायण को हिस्ट्री का हिस्सा मानते हों उनके लिए दो मिनट के मौन के बाद आगे की लाइन्स लिख रही हूँहाँ, अकबर के लिए थोड़ा कन्फ्यूजन रहता है कि ऋतिक या रजत टोकस पर बाजीराव के लिए तो बस रनबीर सिंह...है !!
      वैसे इसमें कोई बुराई वाली बात तो नहीं है लेकिन मेरे जैसे कुछ लोगों के लिए कल्पनाएँमौलिकता और कुछ रचने की ताकत ही दौलत है जिसका छिनना मानो बिलकुल गरीब कर जाता है. मसला बस यही है. मोहेंजो दारो देखने को मैं बेहद उतावली थी.कारण था उसका इतिहास से जुड़ा होना (मुझे बचपन से ही इतिहास पसंद था क्योंकि हिंदी के अलावा यही विषय था जिसमें कहानियां हुआ करती थीं....लेकिन फिर दूसरे बच्चों के जैसे ही मेरे भी ज्ञान-चक्षु खुले कि विज्ञान ही रोज़गार की नैया पार लगायेगा” ....और बस बाकी सब बेकार का बोझा लगने लगा...वो तो बाद में विज्ञान ने जो बारहवीं तक ऐसा रूखा बर्ताव किया कि मैं वापस इतिहास के पास लौट आई लेकिन इस फ़िल्म ने भी यही किया...
मोहेंजो दारो याअग़्रबाह”...??
इस फिल्म को देखकर मन में मोहेंजोदड़ो की जगह अग़्रबाह याद आता है. अग़्रबाह..? अरे! वही.. अपने अलादीन का देश...!! कार्टून भूल गये क्या? देखिए ये रहा...
आगे की तस्वीरों में ऊपर वाली मोहेंजो दारो फिल्म की हैं और उसके ठीक नीचे अलादीन कार्टून की...
फ़िल्म में दिखाया गया बाज़ार और अपने कार्टून वाला एक जैसे दिखाई देते हैं. 
आप ही देखिये कितना मिलता-जुलता है न सबकुछ...? 
चाहे ये दो इमारतों को जोड़ने वाले पुल हों या उनके बीच लगे शामियाने....!!
लगता है कि गोवारिकर अंकल ने सिन्धु घाटी के बारे में पढ़ने के बजाय अलादीन कार्टून देखकर फिल्म बना डाली. इस तरह फिल्म का सेट तो बन गया पर कहानी कौन बनाता...? तो फिर अंकल पहुँचे भगवान श्रीकृष्ण की शरण में और चुपके से उन्ही की कहानी उठा लाए...! (कृष्ण, गोकुल के गाँव से मथुरा जैसे शहर में आ, क्रूर राजा की सत्ता उखाड़ फ़ेंकते हैं. फिल्म का सरमन भी कुछ ऐसी ही नियति लिखवा कर लाया दीखता है ) ज़रा सोचियेगा तो समझ जाइएगा.                
        खैर..कुछेक चीजें अंकल ने सही भी की हैं, जैसे सिन्धुघाटी से मिली त्रिफुलिया शॉल वाले पुरोहित की मूर्ति को साकार कर दिया...हिरोईन के वो खूबसूरत मुकुटनुमा गहने जो सिन्धुघाटी से मिली मृण्मूर्तियों को देख के बनाए गये हैं-
इसके लिए गोवारिकर जी “लख लख थोरा ” (माने थैंक यू..जैसा कि मोहेंजो दारो में लोग कहते हैं )

लेकिन आपके पास मौका था...चाहते तो लासानी फिल्म बना सकते थे जिसमें हीरो-विलेन और दबे-कुचले लोगों के घिसे-पिटे किस्सों से इतर एक अनूठे समाज की जादुई कहानी होती....
आप चूक गए!!
सारे डर बरकरार हैं...
                                                        -विशिष्टा ©